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वैकुण्ठ

Vaikuntha

जहाँ रज, तम और काल का विक्रम नहीं, न माया का प्रवेश

'प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे' (भा. २.९.१०); निवासी चतुर्भुज और श्री मूर्तिमती वहाँ विराजती हैं (भा. २.९.११, १३)।