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विद्या

Vidya

भगवान् के आश्रय वाली, तप के साथ युक्त

भा. ३.९.३० में भगवान् ब्रह्मा से कहते हैं: 'भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान्' — फिर तप में स्थित हों और मेरे आश्रय वाली विद्या में भी; उन दोनों से अन्तर्हृदय में अनावृत लोकों को देखेंगे। भा. ३.९.२६ में मैत्रेय ब्रह्मा की स्तुति को 'तपोविद्यासमाधिभिः' से किया हुआ बताते हैं।