विराट् का आत्मा विदीर्ण होने पर अभिमान ने पद रूप में प्रवेश किया, और अपनी अंश-कर्म से कर्तव्य प्राप्त होता है: 'आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम्' (भा. ३.६.२५)। यह अहंकार से भिन्न सत्ता है, क्योंकि भागवत यहाँ दोनों को अलग-अलग स्थान देता है — अहंकार भा. ३.५.२९-३० में, अभिमान यहाँ।
सिद्धांत
अभिमान
Abhimana
अभिमान — तत्त्व, विराट्-पुरुष के आत्मा में प्रविष्ट होकर कर्तव्य-बोध का कारण। भा. ३.६.२५ में: 'आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम् । कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते'। यह अहंकार से भिन्न माना गया है, क्योंकि भागवत दोनों को अलग-अलग स्थान देता है: अहंकार महत्तत्त्व से उत्पन्न होता है (भा. ३.५.२९-३०), जबकि अभिमान यहाँ विराट् के आत्मा का अधिष्ठान है और कर्म की अंश से कर्तव्य-बोध कराता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.6.25 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)
आत्मा में प्रविष्ट होकर कर्तव्य-बोध का कारण