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सिद्धांत
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भक्ति

Bhakti

अन्य नाम भक्तियोग · भगवच्छिक्षया · Bhakti-yoga

निःस्वार्थ और अविच्छिन्न

परम धर्म वह भक्ति है जो 'अहैतुक्यप्रतिहता' — निःस्वार्थ और अविच्छिन्न है (भा. १.२.६)।

श्रुति-गृहीता, ज्ञान-वैराग्य-युक्ता

श्रद्धालु ज्ञान-वैराग्य सहित श्रुति से गृहीत भक्ति द्वारा आत्मा में आत्म-दर्शन करते हैं: 'भक्त्या श्रुतगृहीतया' (भा. १.२.१२)।

भगवत्तत्त्व-विज्ञान-दायिनी

प्रसन्नचित्त, भक्तियुक्त और मुक्तसङ्ग पुरुष को भगवत्-तत्त्व का विज्ञान होता है: 'भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते' (भा. १.२.२०)।

हृदयग्रन्थि-भेदिका, संशय-छेदिका, कर्मक्षयकारिणी

आत्मा में ईश्वर-दर्शन से: 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः क्षीयन्ते चास्य कर्माणि' (भा. १.२.२१)।

बुधों की नित्य साधना

'अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्' (भा. १.२.२२)।

स्वधर्म त्यागकर भजन में अपक्व गिरने वाले का भी अभद्र नहीं

'त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेः भजनपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि' (भा. १.५.१७)।

तापत्रय की चिकित्सा: ईश्वरे कर्म, ब्रह्मणि भाव

'एतत्संसूचितं ब्रह्मन्तापत्रयचिकित्सितम् यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम्' (भा. १.५.३२)।

समस्त क्रिया-योग संसार-कारण; परम में अर्पित हों तो मुक्ति-साधन

'एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे' (भा. १.५.३४)।

मुकुंद-सेवा योग-मार्गों से श्रेष्ठ

'यमादिभिर्योगपथैः... मुकुंदसेवया यद्वत् तथात्माद्धा न शाम्यति' (भा. १.६.३६)।

दीर्घ सत्सेवा से दृढ़ मति

'सत्सेवयाऽदीर्घया ते जाता मयि दृढा मतिः' (भा. १.६.२४)।

आत्माराम मुनि भी हरि में अहैतुकी भक्ति करते हैं

'आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम्' (भा. १.७.१०)।

श्रवण, कीर्तन, कथन, स्मरण और आनन्द — पञ्चविध अभ्यास

'शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः' (भा. १.८.३६); फल — भव-प्रवाह को रोकने वाले चरण-कमल का दर्शन।

सत्सङ्ग से कुसङ्ग छूटता है; एक बार सुना यश भी छोड़ा नहीं जाता

'सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम्' (भा. १.१०.११)।

हरि-कथा के आगे अन्य वार्ताएँ आयु का व्यर्थ व्यय

'किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः' (भा. १.१६.६); मन्द-बुद्धि की आयु रात्रि में निद्रा और दिन में व्यर्थ कर्मों से हरी जाती है (भा. १.१६.९)।

भक्तों के सङ्ग के एक लव के समान स्वर्ग और मोक्ष भी नहीं

'तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् भगवत्सङ्गिसङ्गस्य' (भा. १.१८.१३)।

भक्त तिरस्कृत, शापित या हत होकर भी प्रतिकार नहीं करते

'तिरस्कृता विप्रलब्धाः शप्ताः क्षिप्ता हता अपि नास्य तत्प्रतिकुर्वन्ति तद्भक्ताः प्रभवोऽपि हि' (भा. १.१८.४८) — यद्यपि वे समर्थ होते हैं।

सन्त तीर्थ-यात्रा के बहाने स्वयं तीर्थों को पवित्र करते हैं

'प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशैः स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्तः' (भा. १.१९.८); स्मरण मात्र से घर शुद्ध होते हैं (भा. १.१९.३३)।

श्रवण, कीर्तन और स्मरण — अभय चाहने वाले का साधन

'श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम्' (भा. २.१.५); विरक्त, सकाम और योगी — तीनों के लिए हरि-नाम-अनुकीर्तन निश्चित (भा. २.१.११)।

धन-मद से अन्धों की सेवा का निषेध — प्रकृति स्वयं पर्याप्त है

'सत्यां क्षितौ किं कशिपोः प्रयासैः' (भा. २.२.४); 'कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान्' (भा. २.२.५)।

वासुदेव-भक्तियोग से भिन्न कोई शिव मार्ग नहीं

'न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्था विशतः संसृताविह । वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत्' (भा. २.२.३३); ब्रह्मा ने वेद को तीन बार देखकर यही निश्चय किया (भा. २.२.३४)।

निष्काम, सर्वकाम अथवा मोक्षकाम — सबके लिए एक ही विधान

'अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः । तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्' (भा. २.३.१०) — यह श्लोक भा. २.३.२–९ की समस्त काम्य-देवता-सूची को अतिक्रान्त कर देता है।

भाव के शारीरिक चिह्न — नेत्रों में जल, रोमों में हर्ष

'तदश्मसारं हृदयं बतेदं यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः । न विक्रियेत' (भा. २.३.२४) — जो हृदय हरि-नाम से विकृत न हो वह लोहा है।

सन्त-सङ्ग से ही भगवान् में अचल भाव उदित होता है

'एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः । भगवत्यचलो भावो यद्भागवतसङ्गतः' (भा. २.३.११)।

किरात, हूण, यवन आदि भी शरणागतों का आश्रय लेकर शुद्ध होते हैं

'किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः । येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति' (भा. २.४.१८)।

श्रद्धा से नित्य श्रवण और कीर्तन से भगवान् शीघ्र हृदय में प्रवेश करते हैं

'शृण्वतः श्रद्धया नित्यं गृणतश्च स्वचेष्टितम् । कालेन नातिदीर्घेण भगवान्विशते हृदि' (भा. २.८.४); कर्ण-रन्ध्र से प्रविष्ट होकर वे शरद् के समान मल धो देते हैं (भा. २.८.५)।

भक्ति — supreme form of — धर्म

भक्ति ही मनुष्यों का परम धर्म घोषित है: 'स वै पुंसां परो धर्मो' (भा. १.२.६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

भक्ति — directed to — श्रीकृष्ण

वह परम धर्म अधोक्षज (कृष्ण) में भक्ति है: 'यतो भक्तिरधोक्षजे' (भा. १.२.६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

भक्ति — yields — वैराग्य

वासुदेव में युक्त भक्तियोग शीघ्र वैराग्य उत्पन्न करता है: 'जनयत्याशु वैराग्यम्' (भा. १.२.७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

भक्ति — yields — ज्ञान

भक्तियोग निःस्वार्थ ज्ञान भी शीघ्र देता है: 'ज्ञानं च यदहैतुकम्' (भा. १.२.७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

भक्ति — cleanses — रजोगुण

कृष्ण-कथा श्रवण हृदय में बैठकर अभद्र को हिला देता है (भा. १.२.१७), जिससे रज-भाव — काम, लोभ आदि — दूर हो जाते हैं (भा. १.२.१९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष शृंखला (१.२.१७-१९)।

भक्ति — cleanses — तमोगुण

भक्ति, भगवत्-श्रवण सहित, रज के साथ तम-भाव को भी धौत करती है (भा. १.२.१७-१९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष शृंखला।