भा. ३.२.२४ में असुरों ने युद्ध में भगवान् को तार्क्ष्य-पुत्र (गरुड़) के कंधे पर, सुनाभ चक्र धारण किये, वेग से आते देखा: 'तार्क्ष्यपुत्रमंसे सुनाभायुधमापतन्तम्' — यहाँ संधि-विच्छेद 'तार्क्ष्य-पुत्रम् + अंसे' है, 'पुत्र मंसे' नहीं।
गरुड
Garuda
गरुड़ कश्यप और विनता के पुत्र, सर्पों के शत्रु और भगवान् विष्णु के वाहन हैं; उन्हें पक्षिराज और वेदमय कहा जाता है, और उनका जन्म तथा माता की दासता से मुक्ति के लिए अमृत-हरण की कथा महाभारत के आदिपर्व में विस्तार से आती है। वैष्णव मन्दिरों में उनकी मूर्ति गर्भगृह के सम्मुख स्थापित होती है। भा. २.७.१६ में वे 'पतगराज' कहे गए हैं और गजेन्द्र के उद्धार के प्रसङ्ग में भगवान् उन्हीं की भुजा पर आरूढ़ होकर आते हैं — 'चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः' — जिससे उनका वाहन-स्वरूप शास्त्र-प्रमाण से स्थापित होता है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.7.16 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=200170)
हरि गरुड़ की भुजा पर आरूढ़ होकर गजेन्द्र की रक्षा के लिए आए: 'चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः' (भा. २.७.१६)। दिशा: वाहन → आरूढ़। प्रमाण: प्रत्यक्ष।