मानभंग होने पर इंद्र ने क्रोध से वर्षा की और व्रज अत्यन्त व्याकुल हो गया; तब भगवान् ने गोत्र को लीला-तपत्र बनाकर उसकी रक्षा की: 'वर्षतीन्द्रे व्रजः कोपाद्भग्नमानेऽतिविह्वलः' (भा. ३.२.३३)।
इन्द्र
Indra
इन्द्र वैदिक देवताओं के राजा, वज्रधारी वृत्रहन्ता और स्वर्गलोक के अधिपति हैं; ऋग्वेद में सर्वाधिक सूक्त उन्हीं को समर्पित हैं। पुराणों में उनका पद एक अधिकार है जिस पर भिन्न-भिन्न कल्पों में भिन्न व्यक्ति आसीन होते हैं, और वे प्रायः भगवान् की लीलाओं में सहायक अथवा शिक्षित होने वाले पात्र के रूप में आते हैं। भा. २.१.२९ में विराट्पुरुष के वर्णन में इन्द्र आदि देवगण उनकी भुजाएँ कहे गए हैं — 'इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः' — अर्थात् देवताओं का समस्त बल भी उसी एक पुरुष के अङ्ग-सामर्थ्य का प्रकाश है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.1.29 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=332515)
इंद्र, अपनी पत्नियों से प्रेरित और क्रोध से अंध होकर, अपनी पूरी शक्ति के साथ कृष्ण से भिड़ने दौड़ा; भागवत उन्हें 'वधूनाम् क्रीडामृग' — स्त्रियों का क्रीड़ा-पशु — कहती है: 'वज्र्याद्रवत्तं सगणो रुषान्धः क्रीडामृगो नूनमयं वधूनाम्' (भा. ३.३.५)।