इन्हीं से जन्मादि अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि-चक्र प्रवर्तता है: 'जन्माद्यस्य यतः' (भा. १.१.१)।
श्रीकृष्ण
Krishna
अन्य नाम वासुदेव · हरिः · केशव · अधोक्षज · उत्तमश्लोक · योगेश्वर · पुण्यश्लोक · नारायण
श्रीकृष्ण का वसुदेव के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.1.12): सात्वतेश्वर भगवान् वसुदेव से उत्पन्न होकर देवकी में जन्मे: 'देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया' (भा. १.१.१२) — षष्ठी 'वसुदेवस्य' पिता-वाचक। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा: कृष्ण → पिता।
गुरु Arjuna राजाश्रीकृष्ण का अर्जुन के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.36): कृष्ण ने आत्म-विद्या से अर्जुन की दोष-बुद्धि दूर की: 'कुमतिमहरदात्मविद्यया' (भा. १.९.३६) — यह भगवद्गीता का ही निर्देश है। दिशा: गुरु → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
गुरु Brahma देवताश्रीकृष्ण का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.1.1): भगवान् ने आदिकवि (ब्रह्मा) के हृदय में ब्रह्म-रूप वेदज्ञान का उपदेश किया। संस्कृत: 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' (भा. १.१.१) — कर्ता 'यः' (भगवान्, 'तेने' क्रिया), द्वितीया 'आदिकवये' = प्राप्तकर्ता। प्रमाण: प्रत्यक्ष (आदिकवि = ब्रह्मा — सर्वमान्य परम्परा)। दिशा सत्यापित: भगवान् → ब्रह्मा। अतिरिक्त प्रमाण (SB 2.2.32): श्रीकृष्ण का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 2.2.32): भगवान् वासुदेव ने आराधित और प्रसन्न होकर पूर्वकाल में ब्रह्मा से ये दोनों सनातन मार्ग कहे: 'ये वै पुरा ब्रह्मण आह तुष्ट आराधितो भगवान् वासुदेवः' (भा. २.२.३२)। दिशा: उपदेष्टा → श्रोता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भाई Subhadra Humanश्रीकृष्ण का सुभद्रा के साथ सम्बन्ध: भाई। स्रोत प्रमाण (SB 1.10.7): सुभद्रा कृष्ण की बहन है: 'स्वसुश्च प्रियकाम्यया' (भा. १.१०.७) — अपनी बहन का प्रिय करने की इच्छा से वे हस्तिनापुर रुके; भा. १.१०.९ में सुभद्रा विरह-कातरों में प्रथम नामित हैं। दिशा: बहन → भाई। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
पिता Pradyumna देवताश्रीकृष्ण का प्रद्युम्न के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 1.10.29): प्रद्युम्न कृष्ण का पुत्र है: भा. १.१०.२९ में 'प्रद्युम्नसाम्बाम्बसुतादयः' — कृष्ण की पत्नियों की सन्तानों में गिने गए। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
पुत्र Devaki Humanश्रीकृष्ण का देवकी के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.1.12): कृष्ण देवकी से उत्पन्न हुए: 'देवक्यां... जातः' (भा. १.१.१२) — सप्तमी 'देवक्यां' माता-वाचक। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा: कृष्ण → माता।
पिता Samba राजाश्रीकृष्ण का साम्ब के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 1.11.19): साम्ब कृष्ण का पुत्र है; भा. १.११.१८ में वे प्रद्युम्न और चारुदेष्ण के साथ कृष्ण के आगमन पर सामने आने वाले पुत्रों में गिने गए हैं, और भा. १.१०.२९ में 'प्रद्युम्नसाम्बाम्बसुतादयः'। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
पिता Charudeshna राजाश्रीकृष्ण का चारुदेष्ण के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 1.11.19): चारुदेष्ण कृष्ण का पुत्र है; भा. १.११.१८ में प्रद्युम्न और साम्ब के साथ गिने गए। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
Husband Jambavati Humanश्रीकृष्ण का जाम्बवती के साथ सम्बन्ध: पति। स्रोत प्रमाण (SB 1.11.19): जाम्बवती कृष्ण की पत्नी है; भा. १.११.१८ में साम्ब को 'जाम्बवतीसुत' कहा गया और साम्ब कृष्ण-पुत्र हैं, अतः वे कृष्ण की रानियों में हैं। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
अपनी स्वकीय दीप्ति में सदा माया-छल से मुक्त: 'निरस्तकुहकं... धाम्ना स्वेन' (भा. १.१.१)।
विद्वान सुरजन भी इनसे विमूढ़ होते हैं: 'मुह्यन्ति यत्सूरयः' (भा. १.१.१)।
इनके अवतार जीवों के क्षेम और उद्धार के लिए होते हैं: 'यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च' (भा. १.१.१३)।
शुद्धि-कामी के सुनने योग्य इनका यश कलि का मल हरता है: 'यशः कलिमलापहम्' (भा. १.१.१६)।
बुद्धिमान इनके उदार कर्म गाते हैं; वे उन्हें अपनी कलाओं से लीला-भाव से करते हैं: 'परिगीतानि सूरिभिः... लीलया दधतः कलाः' (भा. १.१.१७)।
ईश्वररूप में वे अपनी आत्ममाया द्वारा अवतार-कथाओं में स्वैर लीला करते हैं: 'लीला विदधतः स्वैरं ईश्वरस्यात्ममायया' (भा. १.१.१८)।
भगवान् होकर भी गूढ़ रहे, सामान्य मनुष्य-से प्रतीत होते हुए अतिमर्त्य कार्य किए: 'गूढः कपटमानुषः' (भा. १.१.२०)।
एकचित्त से सात्वतेश्वर का श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजन नित्य कर्तव्य: 'श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा' (भा. १.२.१४)।
उनकी कथा सुनने वालों के हृदय में स्थित होकर अभद्र को दूर करते हैं, सज्जनों के सुहृद: 'हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्' (भा. १.२.१७)।
श्रद्धालु शुश्रूषु को सन्तों की सेवा और पुण्य तीर्थों के सेवन से वासुदेव-कथा में रुचि होती है: 'महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात्' (भा. १.२.१६)।
जैसे अवहित अग्नि स्वयोनि (काठों) में एक होकर भी अनेक प्रतीत होती है, वैसे विश्वात्मा पुरुष भूतों में: 'यथाऽवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु' (भा. १.२.३२)।
अपनी सृष्टि — भूतसूक्ष्म, इन्द्रिय, मन — में प्रविष्ट होकर उनके गुणों का भोग करते हैं: 'स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान्' (भा. १.२.३३)।
लोकभावन भगवान् सत्त्व से लोकों का पोषण करते हैं और देव-तिर्यक्-नरादि में लीलावतारों में रमण करते हैं: 'भावयत्येष सत्त्वेन लोकान्वै लोकभावनः' (भा. १.२.३४)।
निर्गुण होकर भी विलसित गुणों में अन्तःप्रविष्ट होकर वे गुणवान्-से प्रतीत होते हैं: 'गुणेषु गुणवानिव... अन्तःप्रविष्ट आभाति' (भा. १.२.३०-३१)।
'हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः... यथाविदासिनःकुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः' (भा. १.३.२६)।
'एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्' (भा. १.३.२८) — अध्याय का महावाक्य।
'य एतत्प्रयतो नरः सायंप्रातर्गृणन्भक्त्या दुःखग्रामाद्विमुच्यते' (भा. १.३.२९)।
'जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः' (भा. १.३.३५)।
'स वा इदं विश्वममोघलीलः सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् भूतेषु चान्तर्हित आत्मतंत्रः' (भा. १.३.३६)।
'नामानि रूपाणि मनोवचोभिः सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः... न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातुरवैति' (भा. १.३.३७)।
'एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः' (भा. १.३.३१)।
'अथेह धन्या भगवन्त इत्थं यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावम्' (भा. १.३.३९)।
'भागवता धर्मा... प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः' (भा. १.४.३१)।
'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते' (भा. १.५.१२)।
'न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजेन्मुकुंदसेव्यन्यवदङ्गसंसृतिम्' (भा. १.५.१९)।
'इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसंभवाः' (भा. १.५.२०)।
'इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा... यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम्' (भा. १.५.२२)।
'ध्यायतश्चरणांभोजं... हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः' (भा. १.६.१७)।
'अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्' (भा. १.६.२२)।
'मत्कामः शनकैः साधु सर्वान् मुञ्चति हृच्छयान्' (भा. १.६.२३)।
'भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम्' (भा. १.६.३५)।
'भक्तानामभयङ्कर' (भा. १.७.२२ — अर्जुन का प्रार्थना-पत्र)।
'जह्यस्त्रतेज उन्नद्धं अस्त्रज्ञो ह्यस्त्रतेजसा' (भा. १.७.२८)।
'भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्नप्रतिक्रियाम्' (भा. १.८.४)।
'व्यसनं वीक्ष्य तत्तेषामनन्यविषयात्मनाम्' (भा. १.८.१३) — रक्षा विशेषतः अनन्य-भाव वालों को मिली।
'जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्' (भा. १.८.२६)।
'न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन्विषमा मतिर्नृणाम्' (भा. १.८.२९)।
'स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः' (भा. १.९.३७) — रथ से कूदकर, चक्र उठाकर, उत्तरीय गिराए हुए दौड़े।
'कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य' (भा. १.९.३६) — स्वजन-वध से विमुख अर्जुन को उपदेश।
'वंशं कुरोर्वंशदवाग्निनिर्हृतं संरोहयित्वा' (भा. १.१०.२) — गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा (भा. १.८.१४) का ही फल।
'य एक आसीदविशेष आत्मनि अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे' (भा. १.१०.२१ — पुर-स्त्रियों का कथन)।
'य एक ईशो जगदात्मलीलया सृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते' (भा. १.१०.२४)।
'यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति… भवाय रूपाणि दधत्युगे युगे' (भा. १.१०.२५)।
'आत्मारामं पूर्णकामं निजलाभेन नित्यदा' (भा. १.११.४) — उन्हें भेंट देना सूर्य को दीप दिखाने जैसा है।
'त्वमेव माताथ सुहृत्पतिः पिता त्वं सद्गुरुर्नः परमं च दैवतम्' (भा. १.११.७ — द्वारका-वासियों का कथन)।
'आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः' (भा. १.११.२३) — प्रह्व-अभिवादन, आलिङ्गन, कर-स्पर्श, स्मित और दृष्टि सबके लिए।
'प्रासादा यत्र पत्नीनां सहस्राणि च षोडश' (भा. १.११.३१) — ये वही स्त्रियाँ हैं जो भौम-वध में मुक्त कराई गईं (भा. १.१०.२९)।
'विधाय वैरं श्वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः' (भा. १.११.३५) — जैसे वायु अग्नि को भड़काती है।
'एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः न युज्यते' (भा. १.११.३९); कामदेव भी जिन स्त्रियों से मोहित हो जाए, वे भी उनकी इन्द्रियों को विचलित न कर सकीं (भा. १.११.३७)।
'ववन्दे शिरसा सप्त देवकीप्रमुखा मुदा' (भा. १.११.२९); माताओं ने उन्हें गोद में बैठाकर नेत्र-जल से सींचा (भा. १.११.३०)।
'स संयुनक्ति भूतानि स एव वियुनक्ति च' (भा. १.१३.४१); खिलौनों के संयोग-वियोग की भाँति यह सब ईश-इच्छा से होता है (भा. १.१३.४३)।
'एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सञ्जहार ह' (भा. १.१५.२६); ब्राह्मण-शाप और वारुणी मदिरा निमित्त बने (भा. १.१५.२२–२३)।
सत्य, शौच, दया, क्षान्ति, त्याग, सन्तोष, आर्जव, शम, दम, तप आदि (भा. १.१६.२८–३०); 'एते चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः… न वियन्ति स्म कर्हिचित्' (भा. १.१६.३१)।
'यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इज्यात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति… अन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा' (भा. १.१७.३४)।
'सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया गृहीतशक्तित्रितयाय' (भा. २.४.१२) — यह परीक्षित के त्रिविध प्रश्न (भा. २.४.६–७) का सूत्र-रूप उत्तर है।
'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । वासुदेवात्परो ब्रह्मन् न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः' (भा. २.५.१४) — यह भा. १.१७.१७–२० की प्रतिस्पर्धी कारण-वादों की सूची का उत्तर है।
'धर्तोच्छिलीन्ध्रमिव सप्तदिनानि सप्तवर्षो महीध्रमनघैककरे सलीलम्' (भा. २.७.३२) — इन्द्र-यज्ञ रुकने पर व्रज की रक्षा हेतु।
'अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्' (भा. २.९.३२); माया की परिभाषा (३३), अन्वय-व्यतिरेक की विधि (३५)।
'तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ' (भा. २.९.२२); 'सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । बिभर्मि तपसा विश्वम्' (भा. २.९.२३)।
सभा में कृष्ण को 'जगद्गुरुः' कहा गया है: 'यदा च पार्थप्रहितः सभायां जगद्गुरुर्यानि जगाद कृष्णः' (भा. ३.१.९)।
विदुर ने उन तीर्थ-पदों का पर्यटन किया जिन्हें सहस्रमूर्ति भगवान् ने स्वयं प्रतिष्ठित किया: 'स्वधिष्ठितो यानि सहस्रमूर्तिः' (भा. ३.१.१७)।
विदुर कहते हैं कि भगवान् शरणागतों के अर्थ के लिये यदुओं में 'अज' होकर प्रकट हुए: 'अर्थाय जातस्य यदुष्वजस्य' (भा. ३.१.४४-४५)।
युधिष्ठिर के राजसूय में कृष्ण को देखकर त्रिलोक ने उन्हें अपना कल्याण-साधन जाना और माना कि विधाता का कौशल पूर्ण रूप से इस लोक में उतर आया है: 'निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः' (भा. ३.२.१३)।
जब उनकी शान्त मूर्तियों पर अन्य रूपों का आक्रमण हो रहा था, तब करुणामय आत्मा वाले परावराधीश ने महत्-अंश से युक्त होकर जन्म लिया, यद्यपि वे अज हैं — जैसे काष्ठ में अग्नि: 'ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः' (भा. ३.२.१५)।
विश्वात्मा भगवान् लोक-वेद के मार्ग का अनुगमन करते हुए द्वारका में कामों का सेवन करते रहे, पर असक्त और सांख्य में स्थित: 'कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः' (भा. ३.३.१९)।
भगवान् कहते हैं कि अपने आदिसर्ग में, नाभि-कमल पर बैठे अज को उन्होंने वह परम ज्ञान कहा था जो उनकी महिमा का अवभास है और जिसे सूरि लोग 'भागवत' कहते हैं: 'पुरा मया प्रोक्तमजाय नाभ्ये पद्मे निषण्णाय ममादिसर्गे' (भा. ३.४.१३)।
भगवान् का विचार था कि उद्धव अणुमात्र भी उनसे न्यून नहीं, क्योंकि वे गुणों से आर्दित नहीं हुए प्रभु हैं; अतः वे उनके मार्ग को लोक को ज्ञात कराते हुए यहीं रहें: 'नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दितः प्रभुः' (भा. ३.४.३०-३१)।
मैत्रेय का वर्णन: आदि में एक ही भगवान् आत्माओं के आत्मा विभु थे; तब वे द्रष्टा थे पर दृश्य को नहीं देखते थे और अपने को असत्-समान मानते थे — 'मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक्' (भा. ३.५.२३-२४)।
भा. ३.६.३४ में चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म से, श्रद्धापूर्वक, आत्मविशुद्धि के लिये, अपने गुरु हरि का यजन करने वाला बताया गया है: 'एते वर्णाः स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम्'। वृत्ति का उल्लेख सह-उत्पत्ति के रूप में है, अतः यहाँ यजन का आधार स्वधर्म है।
भा. ३.७.२८ में भगवान् को 'गुणावतारैर्विश्वस्य सर्गस्थित्यप्ययाश्रयम्' कहा गया है — जो गुणावतारों द्वारा विश्व की सृष्टि, स्थिति और अपय का आश्रय हैं। भा. ३.७.३५ उन्हें 'धर्मयोनि' कहकर उनसे प्रसन्न होने का मार्ग पूछा गया है।
भा. ३.८.१० में उदाप्लुत विश्व में वे अकेले अहीन्द्र के तल्प पर शयन करते हैं, निरीह और आत्म-रति में। भा. ३.८.११ में वे भूत-सूक्ष्म को अन्ःशरीर में रखकर कालात्मिका शक्ति को प्रेरित करते हैं, 'यथानलो दारुणि रुद्धवीर्यः' — जैसे अग्नि दारु में रुद्ध वीर्य वाली। भा. ३.८.१२ में वे चतुर्युगों के सहस्र काल तक सोकर अपने देह में लीन लोकों को देखते हैं।
भा. ३.९.२९-३० में भगवान् कहते हैं: 'मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह' और 'भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम्'। भा. ३.९.३२ में वे शर्त रखते हैं कि जब लोक उन्हें समस्त भूतों में दारुओं में अग्नि के समान देखेगा, तभी कश्मल छूटेगा। भा. ३.९.३५ में वे कहते हैं कि आद्य ऋषि को रजोगुण नहीं बाँधता, क्योंकि सृष्टि करते हुए भी उनका मन भगवान् में निबद्ध है।
कृष्ण सात्वतों के स्वामी हैं: 'भगवान् सात्वतां पतिः' (भा. १.१.१२; पुनः १.२.१४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
घोर संसार में फँसा असहाय जीव भी उनका नाम लेते ही तत्क्षण मुक्त हो जाता है — जिससे स्वयं भय भी भयखाता है: 'यन्नाम विवशो गृणन्... सद्यो विमुच्येत' (भा. १.१.१४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा: मुक्त करने वाले भगवान्; बंधन संसार।
भगवत्-यश कलि का मल हरने वाला है: 'यशः कलिमलापहम्' (भा. १.१.१६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ही धर्म के रक्षा-कवच हैं: 'ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि' (भा. १.१.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। (उनके गमन के बाद धर्म किस शरण गया — यह अनुत्तरित प्रश्न है; जानबूझकर सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया।)
उनके ध्यान में युक्त विद्वान कर्म-ग्रन्थि का बंधन काट देते हैं: 'यदनुध्यासिना युक्ताः... कर्मग्रन्थिनिबन्धनं छिन्दन्ति' (भा. १.२.१५)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
उसी भगवान् ने आदि में अपनी आत्ममाया से, सत्-असत् रूप में इसका सृजन किया: 'स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया सदसद्रूपया' (भा. १.२.३०)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण (बलराम सहित) वृष्णियों में जन्मे: 'वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी' (भा. १.३.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भगवान् (राम सहित) ने पृथ्वी का भार हर लिया: 'भगवानहरद्भरम्' (भा. १.३.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
देवगण हरि की कलाएँ हैं: 'ऋषयो मनवो देवाः... कलाः सर्वे हरेरेव' (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
मनुगण हरि की कलाएँ हैं (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
प्रजापतिगण भी हरि की कलाएँ हैं: 'सप्रजापतयस्तथा' (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण यदु के वंश में प्रकट हुए: 'यदोः प्रियस्य अन्ववाये' (भा. १.८.३२) — जैसे मलय में चन्दन। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण सुदर्शन चक्र के धारक हैं: 'सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभुः' (भा. १.८.१३) — 'स्वास्त्रेण' अर्थात् अपने ही अस्त्र से। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण अर्जुन के सारथि बने: 'सौहृदादथ सारथिम्' (भा. १.९.२०) तथा 'धृतहयरश्मिनि' (भा. १.९.३९) — घोड़ों की रास थामे। दिशा: सारथि → रथी। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण द्वारका (कुशस्थली) के स्वामी हैं: 'पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं स्मितावलोकं स्वपतिं स्म यत्प्रजाः' (भा. १.१०.२७) — जहाँ की प्रजा नित्य अपने स्वामी को देखती है। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण का जन्म मधु-वन (मथुरा) में हुआ: 'अहो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम् यदेष… स्वजन्मना चङ्क्रमणेन चाञ्चति' (भा. १.१०.२६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
वे सब अर्थों को प्रत्यक्ष (अन्वयात्) और परोक्ष (इतरतः) जानते हैं: 'अर्थेष्वभिज्ञः' (भा. १.१.१)।
वे किसी अन्य पर निर्भर नहीं: 'स्वराट्' (भा. १.१.१)।
विवश होकर भी नाम-स्मरण करने वाला तत्क्षण मुक्त होता है — जिससे स्वयं भय भी भयभीत है: 'यद्बिभेति स्वयं भयम्' (भा. १.१.१४)।
भू-लीला पूर्ण कर वे अपने स्वधाम को प्राप्त हुए: 'स्वां काष्ठामधुनोपेते' (भा. १.१.२३)।
उद्धव इसे ही यदुलोक का परम दुर्भाग्य कहते हैं कि कृष्ण रूपी सूर्यमणि के अस्त होने पर भी, उनके साथ रहते हुए भी यदु उन्हें नहीं जान सके — जैसे मछलियाँ चन्द्रमा को नहीं जानतीं: 'ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम्' (भा. ३.२.७-८)।
अपनी माया से कृष्ण एक ही क्षण में उन स्त्रियों के अनेक गृहों में अनुरूप होकर उपस्थित हुए, और प्रकृति की विभूति बढ़ाने की इच्छा से प्रत्येक में अपने समान दश-दश पुत्र उत्पन्न किये: 'आसां मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु योषिताम्' (भा. ३.३.८-९)।
कृष्ण ने निश्चय किया कि जब मद से ताम्र-नेत्र यदु परस्पर विवाद करेंगे, तब उनके वध का अन्य उपाय नहीं है — 'मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म': मुझमें उद्यत होने पर वे स्वयं ही अन्तर्हित हो जायेंगे (भा. ३.३.१४-१६)।
गृहमेध और योग दोनों में अनेक वर्षों तक रममाण रहते हुए उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ: 'तस्यैवं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत' (भा. ३.३.२२)।
अपने कुल का संहार करने की इच्छा से, प्रपन्न की आर्ति हरण करने वाले भगवान् ने उद्धव से कहा — 'बदरीं त्वं प्रयाहि': तुम बदरी को जाओ (भा. ३.४.४)। उद्धव ने आदेश जानते हुए भी, चरण-वियोग में असमर्थ होकर, उनके पीछे ही चलना चुना (भा. ३.४.५)।
जब उद्धव ने हृदय की बात निवेदन की, तब कमल-नेत्र परम भगवान् ने उन्हें आत्मा की परम स्थिति का उपदेश दिया: 'इत्यावेदितहार्दाय मह्यं स भगवान् परः । आदिदेशारविन्दाक्ष आत्मनः परमां स्थितिम्' (भा. ३.४.१९)। इससे पूर्व उन्होंने स्वीकारा कि उद्धव का अन्तर्मन का अभिलाषित वे जानते हैं (भा. ३.४.११)।
केशव (कृष्ण) ने राम (बलराम) के साथ अतिमर्त्य पराक्रम किए: 'कृतवान्किल वीर्याणि सह रामेण केशवः' (भा. १.१.२०) — तृतीया 'रामेण' सहवर्ती। 'राम' = बलराम (टीकाकार-अनुवादक सर्वसम्मत; प्रबल साक्ष्य)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा की: 'स्वमाययावृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे' (भा. १.८.१४) — अपनी ही माया से गर्भ को आवृत किया। दिशा: रक्षक → रक्षित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने देवकी को कंस के बन्धन से मुक्त किया: भा. १.८.२३ में कुन्ती इसी मुक्ति की तुलना अपनी रक्षा से करती हैं — 'त्वयैव नाथेन'। दिशा: मुक्तिदाता → मुक्त। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
कृष्ण ने कुन्ती और उसके पुत्रों की बार-बार रक्षा की: विष, लाक्षागृह की अग्नि, राक्षस, दुष्ट-सभा, वनवास, युद्ध और द्रौणि-अस्त्र से (भा. १.८.२४)। दिशा: रक्षक → रक्षित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने भौम (नरकासुर) का वध किया और सहस्रों बन्दी स्त्रियों को मुक्त कराया: 'याश्चाहृता भौमवधे सहस्रशः' (भा. १.१०.२९)। दिशा: वधकर्ता → वध्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने स्वयंवर में चैद्य (शिशुपाल) आदि बलवानों को परास्त करके वधू का हरण किया: 'प्रमथ्य चैद्यप्रमुखान् हि शुष्मिणः' (भा. १.१०.२९)। दिशा: विजेता → पराजित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने आनर्त पहुँचकर पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया: 'दध्मौ दरवरं तेषां विषादं शमयन्निव' (भा. १.११.१); शङ्ख उनके कर-कमल में और अधर-सङ्ग से लाल हुआ (भा. १.११.२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
कृष्ण ने बिना शस्त्र उठाए राजाओं में परस्पर वैर उत्पन्न करके पृथ्वी का भार उतारा: 'विधाय वैरं श्वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः' (भा. १.११.३५) — यह कुरुक्षेत्र-युद्ध का ही निर्देश है। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भगवान् ने चक्र से ग्राह का मुख काटकर सूँड़ पकड़कर कृपापूर्वक गजेन्द्र को बाहर निकाला: 'चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्माद्धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार' (भा. २.७.१६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शिशु रूप में ही उन्होंने पूतना का प्राण-हरण किया: 'तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकायाः' (भा. २.७.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
विषैले जल की शुद्धि के लिए वे ह्रद में विहार करते हुए अत्यन्त विष-वीर्य वाले सर्प को उखाड़ फेंकेंगे: 'तच्छुद्धयेऽतिविषवीर्यविलोलजिह्वमुच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् ह्रदिन्याम्' (भा. २.७.२८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भगवान् नन्द को वरुण के पाश के भय से मुक्त करेंगे: 'नन्दं च मोक्ष्यति भयाद्वरुणस्य पाशात्' (भा. २.७.३१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।