Sanatan Info

बीटा AI
श्रीकृष्ण
देवता
साझा करें
WhatsApp Facebook X / Twitter Instagram Gmail ईमेल Telegram

श्रीकृष्ण

Krishna

अन्य नाम वासुदेव · हरिः · केशव · अधोक्षज · उत्तमश्लोक · योगेश्वर · पुण्यश्लोक · नारायण

स्वधाम प्रत्यावर्तन

भू-लीला पूर्ण कर वे अपने स्वधाम को प्राप्त हुए: 'स्वां काष्ठामधुनोपेते' (भा. १.१.२३)।

द्वारका-सूर्य का अस्त और काल द्वारा यदुवंश का निगलन

उद्धव इसे ही यदुलोक का परम दुर्भाग्य कहते हैं कि कृष्ण रूपी सूर्यमणि के अस्त होने पर भी, उनके साथ रहते हुए भी यदु उन्हें नहीं जान सके — जैसे मछलियाँ चन्द्रमा को नहीं जानतीं: 'ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम्' (भा. ३.२.७-८)।

एक क्षण में अनेक गृहों में पाणिग्रहण और दश-दश पुत्र

अपनी माया से कृष्ण एक ही क्षण में उन स्त्रियों के अनेक गृहों में अनुरूप होकर उपस्थित हुए, और प्रकृति की विभूति बढ़ाने की इच्छा से प्रत्येक में अपने समान दश-दश पुत्र उत्पन्न किये: 'आसां मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु योषिताम्' (भा. ३.३.८-९)।

यदु-विनाश की योजना का निर्धारण

कृष्ण ने निश्चय किया कि जब मद से ताम्र-नेत्र यदु परस्पर विवाद करेंगे, तब उनके वध का अन्य उपाय नहीं है — 'मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म': मुझमें उद्यत होने पर वे स्वयं ही अन्तर्हित हो जायेंगे (भा. ३.३.१४-१६)।

बहुवर्ष रमण के पश्चात् वैराग्य का उदय

गृहमेध और योग दोनों में अनेक वर्षों तक रममाण रहते हुए उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ: 'तस्यैवं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत' (भा. ३.३.२२)।

कुल-संहार से पूर्व उद्धव को बदरी भेजना

अपने कुल का संहार करने की इच्छा से, प्रपन्न की आर्ति हरण करने वाले भगवान् ने उद्धव से कहा — 'बदरीं त्वं प्रयाहि': तुम बदरी को जाओ (भा. ३.४.४)। उद्धव ने आदेश जानते हुए भी, चरण-वियोग में असमर्थ होकर, उनके पीछे ही चलना चुना (भा. ३.४.५)।

उद्धव को परम आत्म-स्थिति का उपदेश

जब उद्धव ने हृदय की बात निवेदन की, तब कमल-नेत्र परम भगवान् ने उन्हें आत्मा की परम स्थिति का उपदेश दिया: 'इत्यावेदितहार्दाय मह्यं स भगवान् परः । आदिदेशारविन्दाक्ष आत्मनः परमां स्थितिम्' (भा. ३.४.१९)। इससे पूर्व उन्होंने स्वीकारा कि उद्धव का अन्तर्मन का अभिलाषित वे जानते हैं (भा. ३.४.११)।

श्रीकृष्ण — performed heroic deeds with — बलराम

केशव (कृष्ण) ने राम (बलराम) के साथ अतिमर्त्य पराक्रम किए: 'कृतवान्किल वीर्याणि सह रामेण केशवः' (भा. १.१.२०) — तृतीया 'रामेण' सहवर्ती। 'राम' = बलराम (टीकाकार-अनुवादक सर्वसम्मत; प्रबल साक्ष्य)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — protected — महाराज परीक्षित

कृष्ण ने गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा की: 'स्वमाययावृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे' (भा. १.८.१४) — अपनी ही माया से गर्भ को आवृत किया। दिशा: रक्षक → रक्षित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — rescued — देवकी

कृष्ण ने देवकी को कंस के बन्धन से मुक्त किया: भा. १.८.२३ में कुन्ती इसी मुक्ति की तुलना अपनी रक्षा से करती हैं — 'त्वयैव नाथेन'। दिशा: मुक्तिदाता → मुक्त। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।

श्रीकृष्ण — rescued — कुन्ती

कृष्ण ने कुन्ती और उसके पुत्रों की बार-बार रक्षा की: विष, लाक्षागृह की अग्नि, राक्षस, दुष्ट-सभा, वनवास, युद्ध और द्रौणि-अस्त्र से (भा. १.८.२४)। दिशा: रक्षक → रक्षित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — slew — नरकासुर

कृष्ण ने भौम (नरकासुर) का वध किया और सहस्रों बन्दी स्त्रियों को मुक्त कराया: 'याश्चाहृता भौमवधे सहस्रशः' (भा. १.१०.२९)। दिशा: वधकर्ता → वध्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — defeated — शिशुपाल

कृष्ण ने स्वयंवर में चैद्य (शिशुपाल) आदि बलवानों को परास्त करके वधू का हरण किया: 'प्रमथ्य चैद्यप्रमुखान् हि शुष्मिणः' (भा. १.१०.२९)। दिशा: विजेता → पराजित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — blew — पाञ्चजन्य

कृष्ण ने आनर्त पहुँचकर पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया: 'दध्मौ दरवरं तेषां विषादं शमयन्निव' (भा. १.११.१); शङ्ख उनके कर-कमल में और अधर-सङ्ग से लाल हुआ (भा. १.११.२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — ended burden through — कुरुक्षेत्र

कृष्ण ने बिना शस्त्र उठाए राजाओं में परस्पर वैर उत्पन्न करके पृथ्वी का भार उतारा: 'विधाय वैरं श्वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः' (भा. १.११.३५) — यह कुरुक्षेत्र-युद्ध का ही निर्देश है। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — rescued — गजेन्द्र

भगवान् ने चक्र से ग्राह का मुख काटकर सूँड़ पकड़कर कृपापूर्वक गजेन्द्र को बाहर निकाला: 'चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्माद्धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार' (भा. २.७.१६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — slew — पूतना

शिशु रूप में ही उन्होंने पूतना का प्राण-हरण किया: 'तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकायाः' (भा. २.७.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — subdued — कालिय

विषैले जल की शुद्धि के लिए वे ह्रद में विहार करते हुए अत्यन्त विष-वीर्य वाले सर्प को उखाड़ फेंकेंगे: 'तच्छुद्धयेऽतिविषवीर्यविलोलजिह्वमुच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् ह्रदिन्याम्' (भा. २.७.२८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — freed — नन्द

भगवान् नन्द को वरुण के पाश के भय से मुक्त करेंगे: 'नन्दं च मोक्ष्यति भयाद्वरुणस्य पाशात्' (भा. २.७.३१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।