Sanatan Info

बीटा AI
श्रीकृष्ण
देवता
साझा करें
WhatsApp Facebook X / Twitter Instagram Gmail ईमेल Telegram

श्रीकृष्ण

Krishna

अन्य नाम वासुदेव · हरिः · केशव · अधोक्षज · उत्तमश्लोक · योगेश्वर · पुण्यश्लोक · नारायण

उत्पत्ति, स्थिति और लय का मूल

इन्हीं से जन्मादि अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि-चक्र प्रवर्तता है: 'जन्माद्यस्य यतः' (भा. १.१.१)।

सदा छलरहित

अपनी स्वकीय दीप्ति में सदा माया-छल से मुक्त: 'निरस्तकुहकं... धाम्ना स्वेन' (भा. १.१.१)।

विद्वानों को भी चकित करने वाली महिमा

विद्वान सुरजन भी इनसे विमूढ़ होते हैं: 'मुह्यन्ति यत्सूरयः' (भा. १.१.१)।

प्राणियों के कल्याण हेतु अवतार

इनके अवतार जीवों के क्षेम और उद्धार के लिए होते हैं: 'यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च' (भा. १.१.१३)।

यश कलि-मल हरता है

शुद्धि-कामी के सुनने योग्य इनका यश कलि का मल हरता है: 'यशः कलिमलापहम्' (भा. १.१.१६)।

विद्वद्गीत लीलाचरित

बुद्धिमान इनके उदार कर्म गाते हैं; वे उन्हें अपनी कलाओं से लीला-भाव से करते हैं: 'परिगीतानि सूरिभिः... लीलया दधतः कलाः' (भा. १.१.१७)।

आत्ममाया से स्वैर लीला

ईश्वररूप में वे अपनी आत्ममाया द्वारा अवतार-कथाओं में स्वैर लीला करते हैं: 'लीला विदधतः स्वैरं ईश्वरस्यात्ममायया' (भा. १.१.१८)।

मानव-सदृश छिपा दैवत्व

भगवान् होकर भी गूढ़ रहे, सामान्य मनुष्य-से प्रतीत होते हुए अतिमर्त्य कार्य किए: 'गूढः कपटमानुषः' (भा. १.१.२०)।

नित्य श्रवण-कीर्तन-ध्यान-पूजनीय

एकचित्त से सात्वतेश्वर का श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजन नित्य कर्तव्य: 'श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा' (भा. १.२.१४)।

हृदय-निवासी, शुद्धकर्ता, भक्त-बन्धु

उनकी कथा सुनने वालों के हृदय में स्थित होकर अभद्र को दूर करते हैं, सज्जनों के सुहृद: 'हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्' (भा. १.२.१७)।

सन्त-सेवा और तीर्थ-सेवन से कथा-रुचि

श्रद्धालु शुश्रूषु को सन्तों की सेवा और पुण्य तीर्थों के सेवन से वासुदेव-कथा में रुचि होती है: 'महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात्' (भा. १.२.१६)।

एकत्व-मध्ये बहुरूपता — काष्ठ-वह्नि सम

जैसे अवहित अग्नि स्वयोनि (काठों) में एक होकर भी अनेक प्रतीत होती है, वैसे विश्वात्मा पुरुष भूतों में: 'यथाऽवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु' (भा. १.२.३२)।

स्व-सृष्टि में प्रविष्ट

अपनी सृष्टि — भूतसूक्ष्म, इन्द्रिय, मन — में प्रविष्ट होकर उनके गुणों का भोग करते हैं: 'स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान्' (भा. १.२.३३)।

सत्त्व द्वारा लोक-पालन, लीलावतार-रत

लोकभावन भगवान् सत्त्व से लोकों का पोषण करते हैं और देव-तिर्यक्-नरादि में लीलावतारों में रमण करते हैं: 'भावयत्येष सत्त्वेन लोकान्वै लोकभावनः' (भा. १.२.३४)।

निर्गुण होकर गुणी-से प्रतीत

निर्गुण होकर भी विलसित गुणों में अन्तःप्रविष्ट होकर वे गुणवान्-से प्रतीत होते हैं: 'गुणेषु गुणवानिव... अन्तःप्रविष्ट आभाति' (भा. १.२.३०-३१)।

अवतार असंख्य — सरस-कुल्या सम

'हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः... यथाविदासिनःकुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः' (भा. १.३.२६)।

सब अवतार उनके अंश-कला; कृष्ण स्वयं भगवान्

'एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्' (भा. १.३.२८) — अध्याय का महावाक्य।

जन्म-कथन से दुःखग्राम से मुक्ति

'य एतत्प्रयतो नरः सायंप्रातर्गृणन्भक्त्या दुःखग्रामाद्विमुच्यते' (भा. १.३.२९)।

अज-अकर्ता, जिनके जन्म-कर्म वेदगुह्य

'जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः' (भा. १.३.३५)।

सृजति-पालयति-संहरति; अनासक्त; भूतान्तर्हित

'स वा इदं विश्वममोघलीलः सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् भूतेषु चान्तर्हित आत्मतंत्रः' (भा. १.३.३६)।

नाम-रूप प्रसारक, नट-सम; अतर्क्य महिमा

'नामानि रूपाणि मनोवचोभिः सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः... न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातुरवैति' (भा. १.३.३७)।

द्रष्टा पर दृश्य-संसर्ग आरोपित

'एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः' (भा. १.३.३१)।

वासुदेव-शरण आत्मसमर्पक धन्य

'अथेह धन्या भगवन्त इत्थं यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावम्' (भा. १.३.३९)।

भागवत-धर्म इन्हें प्रिय, परमहंसों के प्रिय

'भागवता धर्मा... प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः' (भा. १.४.३१)।

अच्युत-भाव रहित नैष्कर्म्य शोभा नहीं देता

'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते' (भा. १.५.१२)।

मुकुंद-सेवा का आस्वाद लेने वाला संसार में लौटता नहीं

'न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजेन्मुकुंदसेव्यन्यवदङ्गसंसृतिम्' (भा. १.५.१९)।

यह विश्व भगवान् से भिन्न नहीं

'इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसंभवाः' (भा. १.५.२०)।

समस्त साधनों का अविच्युत अर्थ: उत्तमश्लोक का गुणानुवर्णन

'इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा... यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम्' (भा. १.५.२२)।

ध्यानरत भक्त के हृदय में प्रकट होते हैं

'ध्यायतश्चरणांभोजं... हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः' (भा. १.६.१७)।

अविपक्व-कषाय योगियों के लिए दुर्दर्श

'अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्' (भा. १.६.२२)।

मत्काम सर्व हृदय-शोकों को छोड़ता है

'मत्कामः शनकैः साधु सर्वान् मुञ्चति हृच्छयान्' (भा. १.६.२३)।

संसार-सिन्धु का प्लावक: हरि-चर्या-अनुवर्णन

'भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम्' (भा. १.६.३५)।

भक्तों के अभय-दाता

'भक्तानामभयङ्कर' (भा. १.७.२२ — अर्जुन का प्रार्थना-पत्र)।

ब्रह्मास्त्र के प्रतिकार का उपदेश दिया

'जह्यस्त्रतेज उन्नद्धं अस्त्रज्ञो ह्यस्त्रतेजसा' (भा. १.७.२८)।

काल की अप्रतिकार्य गति दिखाकर शोकार्तों को सान्त्वना दी

'भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्नप्रतिक्रियाम्' (भा. १.८.४)।

अनन्य-भक्तों की रक्षा सुदर्शन से की

'व्यसनं वीक्ष्य तत्तेषामनन्यविषयात्मनाम्' (भा. १.८.१३) — रक्षा विशेषतः अनन्य-भाव वालों को मिली।

अकिञ्चनों को ही सुलभ; जन्म-ऐश्वर्य-विद्या-श्री का मद बाधक

'जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्' (भा. १.८.२६)।

न कोई प्रिय, न कोई द्वेष्य — विषमता मनुष्य-बुद्धि में है

'न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन्विषमा मतिर्नृणाम्' (भा. १.८.२९)।

भीष्म की प्रतिज्ञा सत्य करने को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी

'स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः' (भा. १.९.३७) — रथ से कूदकर, चक्र उठाकर, उत्तरीय गिराए हुए दौड़े।

गीता में अर्जुन की दोष-बुद्धि आत्म-विद्या से हरी

'कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य' (भा. १.९.३६) — स्वजन-वध से विमुख अर्जुन को उपदेश।

कुरु-वंश को पुनः अंकुरित किया

'वंशं कुरोर्वंशदवाग्निनिर्हृतं संरोहयित्वा' (भा. १.१०.२) — गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा (भा. १.८.१४) का ही फल।

प्रलय में एकमात्र अविशेष रूप से विद्यमान

'य एक आसीदविशेष आत्मनि अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे' (भा. १.१०.२१ — पुर-स्त्रियों का कथन)।

लीला-मात्र से सृष्टि, रक्षा और संहार; फिर भी अनासक्त

'य एक ईशो जगदात्मलीलया सृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते' (भा. १.१०.२४)।

अधर्म बढ़ने पर युग-युग में रूप धारण करते हैं

'यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति… भवाय रूपाणि दधत्युगे युगे' (भा. १.१०.२५)।

आत्माराम और पूर्णकाम — निज-लाभ से नित्य तृप्त

'आत्मारामं पूर्णकामं निजलाभेन नित्यदा' (भा. १.११.४) — उन्हें भेंट देना सूर्य को दीप दिखाने जैसा है।

भक्तों के लिए माता, सुहृद्, पति, पिता, सद्‍गुरु और परम दैवत

'त्वमेव माताथ सुहृत्पतिः पिता त्वं सद्‍गुरुर्नः परमं च दैवतम्' (भा. १.११.७ — द्वारका-वासियों का कथन)।

चाण्डालों तक को अभीष्ट वर देकर आश्वस्त किया

'आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः' (भा. १.११.२३) — प्रह्व-अभिवादन, आलिङ्गन, कर-स्पर्श, स्मित और दृष्टि सबके लिए।

सोलह सहस्र पत्नियों के प्रासाद द्वारका में

'प्रासादा यत्र पत्नीनां सहस्राणि च षोडश' (भा. १.११.३१) — ये वही स्त्रियाँ हैं जो भौम-वध में मुक्त कराई गईं (भा. १.१०.२९)।

बिना शस्त्र उठाए राजाओं का परस्पर वैर से संहार कराया

'विधाय वैरं श्वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः' (भा. १.११.३५) — जैसे वायु अग्नि को भड़काती है।

प्रकृति में स्थित होकर भी उसके गुणों से अस्पृष्ट — यही ईशत्व

'एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्‍गुणैः न युज्यते' (भा. १.११.३९); कामदेव भी जिन स्त्रियों से मोहित हो जाए, वे भी उनकी इन्द्रियों को विचलित न कर सकीं (भा. १.११.३७)।

द्वारका लौटकर देवकी आदि सात माताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया

'ववन्दे शिरसा सप्त देवकीप्रमुखा मुदा' (भा. १.११.२९); माताओं ने उन्हें गोद में बैठाकर नेत्र-जल से सींचा (भा. १.११.३०)।

वही प्राणियों को जोड़ता और वही अलग करता है

'स संयुनक्ति भूतानि स एव वियुनक्ति च' (भा. १.१३.४१); खिलौनों के संयोग-वियोग की भाँति यह सब ईश-इच्छा से होता है (भा. १.१३.४३)।

यदुओं से ही यदुओं का संहार कराकर भू-भार उतारा

'एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सञ्जहार ह' (भा. १.१५.२६); ब्राह्मण-शाप और वारुणी मदिरा निमित्त बने (भा. १.१५.२२–२३)।

उनतालीस महागुणों के नित्य आश्रय

सत्य, शौच, दया, क्षान्ति, त्याग, सन्तोष, आर्जव, शम, दम, तप आदि (भा. १.१६.२८–३०); 'एते चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः… न वियन्ति स्म कर्हिचित्' (भा. १.१६.३१)।

यज्ञ-स्वरूप; भीतर-बाहर वायु की भाँति व्याप्त आत्मा

'यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इज्यात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति… अन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा' (भा. १.१७.३४)।

सृष्टि, स्थिति और संहार की लीला के लिए तीन शक्तियों का ग्रहण

'सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया गृहीतशक्तित्रितयाय' (भा. २.४.१२) — यह परीक्षित के त्रिविध प्रश्न (भा. २.४.६–७) का सूत्र-रूप उत्तर है।

द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव — वासुदेव से भिन्न कोई तत्त्व नहीं

'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । वासुदेवात्परो ब्रह्मन् न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः' (भा. २.५.१४) — यह भा. १.१७.१७–२० की प्रतिस्पर्धी कारण-वादों की सूची का उत्तर है।

सात वर्ष की अवस्था में सात दिन एक हाथ पर गोवर्धन धारण

'धर्तोच्छिलीन्ध्रमिव सप्तदिनानि सप्तवर्षो महीध्रमनघैककरे सलीलम्' (भा. २.७.३२) — इन्द्र-यज्ञ रुकने पर व्रज की रक्षा हेतु।

चतुःश्लोकी — 'सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था; जो शेष रहता है वह भी मैं'

'अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्' (भा. २.९.३२); माया की परिभाषा (३३), अन्वय-व्यतिरेक की विधि (३५)।

तप ही उनका हृदय; तप से ही सृष्टि, संहार और भरण

'तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ' (भा. २.९.२२); 'सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । बिभर्मि तपसा विश्वम्' (भा. २.९.२३)।

जगद्गुरु — संसार के गुरु

सभा में कृष्ण को 'जगद्गुरुः' कहा गया है: 'यदा च पार्थप्रहितः सभायां जगद्गुरुर्यानि जगाद कृष्णः' (भा. ३.१.९)।

सहस्रमूर्ति — तीर्थ-स्थानों के प्रतिष्ठाता

विदुर ने उन तीर्थ-पदों का पर्यटन किया जिन्हें सहस्रमूर्ति भगवान् ने स्वयं प्रतिष्ठित किया: 'स्वधिष्ठितो यानि सहस्रमूर्तिः' (भा. ३.१.१७)।

अज — अजन्मा, यदुओं में प्रकट

विदुर कहते हैं कि भगवान् शरणागतों के अर्थ के लिये यदुओं में 'अज' होकर प्रकट हुए: 'अर्थाय जातस्य यदुष्वजस्य' (भा. ३.१.४४-४५)।

त्रिलोक द्वारा कल्याण-साधन माना जाना

युधिष्ठिर के राजसूय में कृष्ण को देखकर त्रिलोक ने उन्हें अपना कल्याण-साधन जाना और माना कि विधाता का कौशल पूर्ण रूप से इस लोक में उतर आया है: 'निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः' (भा. ३.२.१३)।

महत्-अंश से युक्त होकर अज का भी जन्म ग्रहण करना

जब उनकी शान्त मूर्तियों पर अन्य रूपों का आक्रमण हो रहा था, तब करुणामय आत्मा वाले परावराधीश ने महत्-अंश से युक्त होकर जन्म लिया, यद्यपि वे अज हैं — जैसे काष्ठ में अग्नि: 'ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः' (भा. ३.२.१५)।

द्वारका में काम-सेवन करते हुए भी असक्त और सांख्य-स्थ

विश्वात्मा भगवान् लोक-वेद के मार्ग का अनुगमन करते हुए द्वारका में कामों का सेवन करते रहे, पर असक्त और सांख्य में स्थित: 'कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः' (भा. ३.३.१९)।

भागवत का आदि-उपदेश अज (ब्रह्मा) को

भगवान् कहते हैं कि अपने आदिसर्ग में, नाभि-कमल पर बैठे अज को उन्होंने वह परम ज्ञान कहा था जो उनकी महिमा का अवभास है और जिसे सूरि लोग 'भागवत' कहते हैं: 'पुरा मया प्रोक्तमजाय नाभ्ये पद्मे निषण्णाय ममादिसर्गे' (भा. ३.४.१३)।

उद्धव के शेष रहने का कारण — गुणों से अनार्द्रता

भगवान् का विचार था कि उद्धव अणुमात्र भी उनसे न्यून नहीं, क्योंकि वे गुणों से आर्दित नहीं हुए प्रभु हैं; अतः वे उनके मार्ग को लोक को ज्ञात कराते हुए यहीं रहें: 'नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दितः प्रभुः' (भा. ३.४.३०-३१)।

आदि में एक, सुप्त-शक्ति और असुप्त-दृष्टि

मैत्रेय का वर्णन: आदि में एक ही भगवान् आत्माओं के आत्मा विभु थे; तब वे द्रष्टा थे पर दृश्य को नहीं देखते थे और अपने को असत्-समान मानते थे — 'मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक्' (भा. ३.५.२३-२४)।

समस्त वृत्ति के चार वर्ण अपने धर्म से उनका यजन करते हैं

भा. ३.६.३४ में चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म से, श्रद्धापूर्वक, आत्मविशुद्धि के लिये, अपने गुरु हरि का यजन करने वाला बताया गया है: 'एते वर्णाः स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम्'। वृत्ति का उल्लेख सह-उत्पत्ति के रूप में है, अतः यहाँ यजन का आधार स्वधर्म है।

गुणावतारों द्वारा सृष्टि, स्थिति और अपय का आश्रय

भा. ३.७.२८ में भगवान् को 'गुणावतारैर्विश्वस्य सर्गस्थित्यप्ययाश्रयम्' कहा गया है — जो गुणावतारों द्वारा विश्व की सृष्टि, स्थिति और अपय का आश्रय हैं। भा. ३.७.३५ उन्हें 'धर्मयोनि' कहकर उनसे प्रसन्न होने का मार्ग पूछा गया है।

अहीन्द्र के तल्प पर निरीह शयन

भा. ३.८.१० में उदाप्लुत विश्व में वे अकेले अहीन्द्र के तल्प पर शयन करते हैं, निरीह और आत्म-रति में। भा. ३.८.११ में वे भूत-सूक्ष्म को अन्ःशरीर में रखकर कालात्मिका शक्ति को प्रेरित करते हैं, 'यथानलो दारुणि रुद्धवीर्यः' — जैसे अग्नि दारु में रुद्ध वीर्य वाली। भा. ३.८.१२ में वे चतुर्युगों के सहस्र काल तक सोकर अपने देह में लीन लोकों को देखते हैं।

ब्रह्मा को तप और विद्या में स्थित होने का आदेश

भा. ३.९.२९-३० में भगवान् कहते हैं: 'मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह' और 'भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम्'। भा. ३.९.३२ में वे शर्त रखते हैं कि जब लोक उन्हें समस्त भूतों में दारुओं में अग्नि के समान देखेगा, तभी कश्मल छूटेगा। भा. ३.९.३५ में वे कहते हैं कि आद्य ऋषि को रजोगुण नहीं बाँधता, क्योंकि सृष्टि करते हुए भी उनका मन भगवान् में निबद्ध है।

श्रीकृष्ण — lord of — सात्वत (यादव कुल)

कृष्ण सात्वतों के स्वामी हैं: 'भगवान् सात्वतां पतिः' (भा. १.१.१२; पुनः १.२.१४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — liberates from — संसार

घोर संसार में फँसा असहाय जीव भी उनका नाम लेते ही तत्क्षण मुक्त हो जाता है — जिससे स्वयं भय भी भयखाता है: 'यन्नाम विवशो गृणन्... सद्यो विमुच्येत' (भा. १.१.१४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा: मुक्त करने वाले भगवान्; बंधन संसार।

श्रीकृष्ण — dispels stain of — कलियुग

भगवत्-यश कलि का मल हरने वाला है: 'यशः कलिमलापहम्' (भा. १.१.१६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — protector of — धर्म

कृष्ण ही धर्म के रक्षा-कवच हैं: 'ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि' (भा. १.१.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। (उनके गमन के बाद धर्म किस शरण गया — यह अनुत्तरित प्रश्न है; जानबूझकर सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया।)

श्रीकृष्ण — liberates from — कर्म

उनके ध्यान में युक्त विद्वान कर्म-ग्रन्थि का बंधन काट देते हैं: 'यदनुध्यासिना युक्ताः... कर्मग्रन्थिनिबन्धनं छिन्दन्ति' (भा. १.२.१५)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — creates through — माया

उसी भगवान् ने आदि में अपनी आत्ममाया से, सत्-असत् रूप में इसका सृजन किया: 'स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया सदसद्रूपया' (भा. १.२.३०)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — born in — वृष्णि कुल

कृष्ण (बलराम सहित) वृष्णियों में जन्मे: 'वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी' (भा. १.३.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — relieved burden of — पृथ्वी

भगवान् (राम सहित) ने पृथ्वी का भार हर लिया: 'भगवानहरद्भरम्' (भा. १.३.२३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — expands as kala — देवगण

देवगण हरि की कलाएँ हैं: 'ऋषयो मनवो देवाः... कलाः सर्वे हरेरेव' (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — expands as kala — मनुगण

मनुगण हरि की कलाएँ हैं (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — expands as kala — प्रजापतिगण

प्रजापतिगण भी हरि की कलाएँ हैं: 'सप्रजापतयस्तथा' (भा. १.३.२७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — born in — यदुवंशी

कृष्ण यदु के वंश में प्रकट हुए: 'यदोः प्रियस्य अन्ववाये' (भा. १.८.३२) — जैसे मलय में चन्दन। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — wields — सुदर्शन चक्र

कृष्ण सुदर्शन चक्र के धारक हैं: 'सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभुः' (भा. १.८.१३) — 'स्वास्त्रेण' अर्थात् अपने ही अस्त्र से। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — charioteer of — अर्जुन

कृष्ण अर्जुन के सारथि बने: 'सौहृदादथ सारथिम्' (भा. १.९.२०) तथा 'धृतहयरश्मिनि' (भा. १.९.३९) — घोड़ों की रास थामे। दिशा: सारथि → रथी। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — resides in — द्वारका

कृष्ण द्वारका (कुशस्थली) के स्वामी हैं: 'पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं स्मितावलोकं स्वपतिं स्म यत्प्रजाः' (भा. १.१०.२७) — जहाँ की प्रजा नित्य अपने स्वामी को देखती है। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीकृष्ण — born in — मथुरा

कृष्ण का जन्म मधु-वन (मथुरा) में हुआ: 'अहो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम् यदेष… स्वजन्मना चङ्क्रमणेन चाञ्चति' (भा. १.१०.२६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।