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कुन्ती

Kunti

अन्य नाम पृथा · Pritha

विपत्तियों को वरदान माना, क्योंकि उनमें भगवद्-दर्शन होता है

'विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्' (भा. १.८.२५) — भागवत की सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रार्थनाओं में से एक।

स्नेह-पाश काटने की प्रार्थना की

'स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णिषु' (भा. १.८.४१) — रक्षा नहीं, वैराग्य माँगा।

गङ्गा-प्रवाह-सी अविच्छिन्न भक्ति की याचना

'रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति' (भा. १.८.४२)।

पाण्डु की मृत्यु के बाद बालक पुत्रों सहित बहुत क्लेश सहे

'संस्थितेऽतिरथे पाण्डौ पृथा बालप्रजा वधूः युष्मत्कृते बहून् क्लेशान् प्राप्ता' (भा. १.९.१३)।

यदु-नाश सुनकर अधोक्षज में एकान्त भक्ति से संसार से विरत

'एकान्तभक्त्या भगवत्यधोक्षजे निवेशितात्मोपररास संसृतेः' (भा. १.१५.३३) — भा. १.८.४१–४२ की उनकी प्रार्थना का फल।

कुन्ती — mother of — पाण्डव

कुन्ती पाण्डवों की माता है: 'विमोचिताहं च सहात्मजा' (भा. १.८.२३) — 'मैं अपने पुत्रों सहित'; तथा भा. १.८.४१ में वे पाण्डवों को 'स्वकेषु' कहती हैं। दिशा: माता → पुत्र। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।