अध्याय के अन्तिम श्लोक में विदुर उस स्वर्ग-सरित की ओर बढ़ते बताये गये हैं जहाँ 'मित्रासुतो मुनिः' — मित्र के पुत्र मुनि मैत्रेय — हैं: 'प्रापद्यत स्वःसरितं यत्र मित्रासुतो मुनिः' (भा. ३.४.३६)। उद्धव भी इन्हें 'कौषारव' कहकर विदुर के समीप बताते हैं (भा. ३.४.२६)।
मैत्रेय
Maitreya
अन्य नाम कौषारवः
मैत्रेय (कौषारव) — कुषारव के पुत्र, परम ज्ञानी ऋषि; पराशर के शिष्य माने जाते हैं। भा. १.१३.१–२ में विदुर उन्हीं से तीर्थयात्रा के दौरान आत्मा की गति का ज्ञान प्राप्त करते हैं, और गोविन्द में अनन्य भक्ति उत्पन्न हो जाने पर आगे प्रश्न करना ही छोड़ देते हैं। तृतीय स्कन्ध का अधिकांश भाग — सृष्टि-क्रम, वराह-अवतार, कपिल-देवहूति संवाद — इन्हीं का विदुर को दिया गया उपदेश है। कृष्ण के देह-त्याग के समय भी वे उपस्थित थे और उन्होंने मैत्रेय को अन्तिम उपदेश दिया।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.13.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110184)
मैत्रेय विदुर से कहते हैं कि भगवान् उन्हें सदा सम्मत मानते हैं, और उन्हीं के ज्ञानोपदेश के लिये व्रज करते हुए भगवान् ने मैत्रेय को आदेश दिया था: 'यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्भगवान् व्रजन्' (भा. ३.५.२१)। यह पूरे उपदेश का अधिकार-सूत्र है।