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मैत्रेय

Maitreya

अन्य नाम कौषारवः

स्वर्ग-सरित के तट पर निवास

अध्याय के अन्तिम श्लोक में विदुर उस स्वर्ग-सरित की ओर बढ़ते बताये गये हैं जहाँ 'मित्रासुतो मुनिः' — मित्र के पुत्र मुनि मैत्रेय — हैं: 'प्रापद्यत स्वःसरितं यत्र मित्रासुतो मुनिः' (भा. ३.४.३६)। उद्धव भी इन्हें 'कौषारव' कहकर विदुर के समीप बताते हैं (भा. ३.४.२६)।

भगवान् द्वारा विदुर के ज्ञानोपदेश हेतु आदिष्ट

मैत्रेय विदुर से कहते हैं कि भगवान् उन्हें सदा सम्मत मानते हैं, और उन्हीं के ज्ञानोपदेश के लिये व्रज करते हुए भगवान् ने मैत्रेय को आदेश दिया था: 'यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्भगवान् व्रजन्' (भा. ३.५.२१)। यह पूरे उपदेश का अधिकार-सूत्र है।