भा. ३.८.३ में कुमार-प्रमुख मुनि, तत्त्व जानने की इच्छा से, पृथ्वी पर आसीन आद्य भगवान् अकुण्ठ-सत्त्व देव संकर्षण से पूछते हैं: 'आसीनमुर्व्यां भगवन्तमाद्यं सङ्कर्षणं देवमकुण्ठसत्त्वम्'। भा. ३.८.७ में वही भगवत्तम सनत्कुमार को यह कहने वाला बताया गया है।
देवता
संकर्षण
Sankarshana
अकुण्ठ-सत्त्व देव, जिनसे कुमार-प्रमुख मुनियों ने प्रश्न किया
कल्पान्त का अग्नि
भा. ३.११.२९ में कल्पान्त के दहन को संकर्षण की शक्ति बताया गया है: 'त्रिलोक्यां दह्यमानायां शक्त्या सङ्कर्षणाग्निना । यान्त्यूष्मणा महर्लोकाज्जनं भृग्वादयोऽर्दिताः' — त्रिलोकी के दहने पर महर्लोक से जन और भृगु आदि उष्मा से आर्दित होकर चले जाते हैं।
संकर्षण — vyuha of — श्रीकृष्ण
संकर्षण वासुदेव के चतुर्व्यूह रूपों में एक हैं: 'प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च' (भा. १.५.३७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।