भा. ३.१०.१३-१७ में छह प्राकृत सर्ग गिनाये गये हैं: आद्य महत् से (१४), द्वितीय अहं से (१५), तृतीय भूत-सर्ग तन्मात्र (१५), चतुर्थ ऐन्द्रिय (१६), पञ्चम वैकारिक देव-सर्ग जिससे मन (१६), और षष्ठ तामस (१७)। भा. ३.१०.१८-२५ में वैकृत सर्ग आते हैं: सप्तम मुख्य सर्ग षड्विध स्थावरों का (१८-१९), अष्टम तिर्यक् अट्ठाईस प्रकार का (२०), और नवम अर्वाक्स्रोत मनुष्यों का (२५)। भा. ३.१०.२८ में इन दश को 'विश्वसृक्कृताः' — विश्वसृज् द्वारा कृत — कहा गया है।
सर्ग
Sarga
अन्य नाम Prakrita-sarga (the natural creation)
सर्ग — सृष्टि, जिसे भागवत दशविध बताता है। भा. ३.१०.१३ में मैत्रेय कहते हैं: 'यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् । सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु यः' — जैसा अब है वैसा आदि में था और पश्चात् भी होगा; सर्ग नवविध है, प्राकृत और वैकृत। छह प्राकृत हैं — महत्, अहं, भूत, ऐन्द्रिय, वैकारिक देव-सर्ग और तामस (भा. ३.१०.१४-१७)। तीन वैकृत हैं — मुख्य सर्ग स्थावरों का षड्विध, तिर्यक् अट्ठाईस प्रकार का, और अर्वाक्स्रोत मनुष्यों का (भा. ३.१०.१८-२५); इनके साथ देव-सर्ग जोड़कर दश पूरे होते हैं (भा. ३.१०.२६-२८)। भा. ३.१०.१४ में प्रतिसंक्रम काल, द्रव्य और गुण से त्रिविध बताया गया है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.10.13 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)