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सर्ग

Sarga

अन्य नाम Prakrita-sarga (the natural creation)

सर्ग — सृष्टि, जिसे भागवत दशविध बताता है। भा. ३.१०.१३ में मैत्रेय कहते हैं: 'यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् । सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु यः' — जैसा अब है वैसा आदि में था और पश्चात् भी होगा; सर्ग नवविध है, प्राकृत और वैकृत। छह प्राकृत हैं — महत्, अहं, भूत, ऐन्द्रिय, वैकारिक देव-सर्ग और तामस (भा. ३.१०.१४-१७)। तीन वैकृत हैं — मुख्य सर्ग स्थावरों का षड्विध, तिर्यक् अट्ठाईस प्रकार का, और अर्वाक्स्रोत मनुष्यों का (भा. ३.१०.१८-२५); इनके साथ देव-सर्ग जोड़कर दश पूरे होते हैं (भा. ३.१०.२६-२८)। भा. ३.१०.१४ में प्रतिसंक्रम काल, द्रव्य और गुण से त्रिविध बताया गया है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 3.10.13 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर अध्याय-पृष्ठ; देवनागरी पाठ सत्यापित प्रतिलिपि से — validation/sanskrit_skandha3.json)