Sanatan Info

बीटा AI
ग्रंथ
साझा करें
WhatsApp Facebook X / Twitter Instagram Gmail ईमेल Telegram

श्रीमद्भागवत

Srimad Bhagavata Purana

अन्य नाम ब्रह्मसम्मितम् · पुराणार्कः · सात्वती श्रुतिः · भागवतम् · Brahma-sammita (measured as Brahman) · Purana-arka (sun among the Puranas) · Satvati-shruti (the Veda of the Satvatas) · Srimad Bhagavatam

छलमय धर्म का पूर्ण त्याग

यहाँ का धर्म कैतव-छल से पूर्णतः रहित है: 'धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र' (भा. १.१.२)।

निःस्पृह सज्जनों का परम धर्म

यह निर्मत्सर सज्जनों का परम धर्म है: 'परमो निर्मत्सराणां सताम्' (भा. १.१.२)।

तापत्रय-नाशक, शिवदायक

यह वास्तविक तत्त्व जानाता, कल्याणकारी है और तापत्रय का मूलोच्छेद करता है: 'वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्' (भा. १.१.२)।

सेवक-हृदय में तत्क्षण भगवत्-प्रतिष्ठा

इसकी सेवा-शुश्रूषा से भगवान् तत्क्षण हृदय में प्रतिष्ठित हो जाते हैं: 'सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिः तत्क्षणात्' (भा. १.१.२)।

शुकमुखामृतधारा, पका फल

यह वेद-कल्पतरु का अमृत-मिश्रित पका फल है: 'निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्' (भा. १.१.३)।

नित्य सेवा से दृढ़ भक्ति

भागवत की नित्य सेवा से भगवान् में नैष्ठिकी भक्ति होती है: 'भागवतसेवया भक्तिर्भवति नैष्ठिकी' (भा. १.२.१८)।

ब्रह्मसम्मित, उत्तमश्लोक-चरित, भगवान् ऋषि-रचित

'इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवान् ऋषिः' (भा. १.३.४०)।

कलि-नष्टदृश के लिए उदित पुराणार्क

'कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः' (भा. १.३.४४)।

ब्रह्मा को भगवान् द्वारा कथित; नारद को विस्तार का आदेश

'इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् । सङ्ग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद्विपुलीकुरु' (भा. २.७.५१) — यही परम्परा भा. १.५ में नारद से व्यास तक पहुँचती है।

परीक्षित के प्रश्न ही शेष स्कन्धों का विषय-क्रम बनते हैं

कल्प-मान, काल-गति, अण्डकोश-परिमाण, वर्णाश्रम-निश्चय, युग-धर्म, अवतार-चरित, तत्त्व-सङ्ख्यान, योग-विधि, प्रलय, बन्ध-मोक्ष (भा. २.८.१२–२३); 'आनुपूर्व्येण तत्सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे' (भा. २.८.२९)।

दश-लक्षण वाला पुराण; परम्परा — भगवान् → ब्रह्मा → नारद → व्यास

'तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम् । प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत्' (भा. २.९.४३); 'नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे… व्यासाय' (भा. २.९.४४) — यही परम्परा भा. १.५ में पूर्ण होती है।

नौ लक्षण केवल दसवें (आश्रय) की विशुद्धि के लिए वर्णित

'दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् । वर्णयन्ति महात्मानः' (भा. २.१०.२) — यह सम्पूर्ण पुराण की संरचना का सूत्र है।

भगवान् द्वारा साक्षात् ऋषियों से कथित

मैत्रेय भागवत पुराण को प्रवर्तित करने का अपना कारण बताते हैं और उसकी परम्परा को भगवान् तक ले जाते हैं: 'प्रवर्तये भागवतं पुराणं यदाह साक्षाद्भगवान् ऋषिभ्यः' (भा. ३.८.२)। 'साक्षात्' शब्द कथन की प्रत्यक्षता बताता है।

श्रीमद्भागवत — composed by — वेदव्यास

श्रीमद्भागवत की रचना महामुनि (वेदव्यास) ने की: 'श्रीमद्भागवते महामुनिकृते' (भा. १.१.२); १.२.४ में व्यास स्वयं बोलते हैं और पुष्पिका 'वेदव्यासः' है। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।

श्रीमद्भागवत — narrated by — शुकदेव

भागवत-रस शुकदेव के मुख से प्राप्त हुआ: 'शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्' (भा. १.१.३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा सत्यापित: ग्रंथ ← वक्ता।

श्रीमद्भागवत — ripened fruit of — वेद

भागवत वेदरूपी निगम-कल्पतरु का पका हुआ फल है: 'निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्' (भा. १.१.३)। पाठ-प्रतिपादित रूपक। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीमद्भागवत — awakens — भक्ति

भागवत की नित्य सेवा से अभद्र लगभग नष्ट हो जाने पर भगवान् में दृढ़ भक्ति होती है: 'नित्यं भागवतसेवया... भक्तिर्भवति नैष्ठिकी' (भा. १.२.१८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीमद्भागवत — essence of all — वेद

भागवत सर्ववेदों के सार का भी सार है: 'सर्ववेदेतिहासानां सारं सारम्' (भा. १.३.४२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।

श्रीमद्भागवत — essence of all — इतिहास

भागवत इतिहासों का भी सार है (भा. १.३.४२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।