यहाँ का धर्म कैतव-छल से पूर्णतः रहित है: 'धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र' (भा. १.१.२)।
श्रीमद्भागवत
Srimad Bhagavata Purana
अन्य नाम ब्रह्मसम्मितम् · पुराणार्कः · सात्वती श्रुतिः · भागवतम् · Brahma-sammita (measured as Brahman) · Purana-arka (sun among the Puranas) · Satvati-shruti (the Veda of the Satvatas) · Srimad Bhagavatam
श्रीमद्भागवत पुराण — अष्टादश महापुराणों में श्रेष्ठ, वेदव्यास-विरचित, कृष्ण-भक्ति-केन्द्रित ग्रंथ; वैष्णव परम्परा इसे 'पाँचवा वेद' कहती है। संसाधित पदों में: यह छल-रहित परम धर्म है — निःस्पृह सज्जनों का धर्म; परम तत्त्व जानाता, तापत्रय-मूलोच्छेदक (भा. १.१.२); वेद-कल्पतरु का शुकमुख से प्राप्त पका फल (१.१.३); 'ब्रह्मसम्मित' उत्तमश्लोक-चरित, भगवान् ऋषि-रचित (१.३.४०); सर्ववेदेतिहासों के सार का भी सार (१.३.४२); कलि-पीड़ितों के लिए उदित पुराणार्क (१.३.४४)। इसकी नित्य सेवा से दृढ़ भक्ति होती है (१.२.१८) और सेवक के हृदय में भगवान् तत्क्षण प्रतिष्ठित होते हैं (१.१.२)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.2 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
यह निर्मत्सर सज्जनों का परम धर्म है: 'परमो निर्मत्सराणां सताम्' (भा. १.१.२)।
यह वास्तविक तत्त्व जानाता, कल्याणकारी है और तापत्रय का मूलोच्छेद करता है: 'वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्' (भा. १.१.२)।
इसकी सेवा-शुश्रूषा से भगवान् तत्क्षण हृदय में प्रतिष्ठित हो जाते हैं: 'सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिः तत्क्षणात्' (भा. १.१.२)।
यह वेद-कल्पतरु का अमृत-मिश्रित पका फल है: 'निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्' (भा. १.१.३)।
भागवत की नित्य सेवा से भगवान् में नैष्ठिकी भक्ति होती है: 'भागवतसेवया भक्तिर्भवति नैष्ठिकी' (भा. १.२.१८)।
'इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवान् ऋषिः' (भा. १.३.४०)।
'कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः' (भा. १.३.४४)।
'इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् । सङ्ग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद्विपुलीकुरु' (भा. २.७.५१) — यही परम्परा भा. १.५ में नारद से व्यास तक पहुँचती है।
कल्प-मान, काल-गति, अण्डकोश-परिमाण, वर्णाश्रम-निश्चय, युग-धर्म, अवतार-चरित, तत्त्व-सङ्ख्यान, योग-विधि, प्रलय, बन्ध-मोक्ष (भा. २.८.१२–२३); 'आनुपूर्व्येण तत्सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे' (भा. २.८.२९)।
'तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम् । प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत्' (भा. २.९.४३); 'नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे… व्यासाय' (भा. २.९.४४) — यही परम्परा भा. १.५ में पूर्ण होती है।
'दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् । वर्णयन्ति महात्मानः' (भा. २.१०.२) — यह सम्पूर्ण पुराण की संरचना का सूत्र है।
मैत्रेय भागवत पुराण को प्रवर्तित करने का अपना कारण बताते हैं और उसकी परम्परा को भगवान् तक ले जाते हैं: 'प्रवर्तये भागवतं पुराणं यदाह साक्षाद्भगवान् ऋषिभ्यः' (भा. ३.८.२)। 'साक्षात्' शब्द कथन की प्रत्यक्षता बताता है।
श्रीमद्भागवत की रचना महामुनि (वेदव्यास) ने की: 'श्रीमद्भागवते महामुनिकृते' (भा. १.१.२); १.२.४ में व्यास स्वयं बोलते हैं और पुष्पिका 'वेदव्यासः' है। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
भागवत-रस शुकदेव के मुख से प्राप्त हुआ: 'शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्' (भा. १.१.३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। दिशा सत्यापित: ग्रंथ ← वक्ता।
भागवत वेदरूपी निगम-कल्पतरु का पका हुआ फल है: 'निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्' (भा. १.१.३)। पाठ-प्रतिपादित रूपक। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भागवत की नित्य सेवा से अभद्र लगभग नष्ट हो जाने पर भगवान् में दृढ़ भक्ति होती है: 'नित्यं भागवतसेवया... भक्तिर्भवति नैष्ठिकी' (भा. १.२.१८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भागवत सर्ववेदों के सार का भी सार है: 'सर्ववेदेतिहासानां सारं सारम्' (भा. १.३.४२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
भागवत इतिहासों का भी सार है (भा. १.३.४२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।