वे बिना दीक्षाग्रहण के, बाह्य कृत्य त्यागकर, परमतत्त्व-मग्न होकर निकल पड़े: 'यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं' (भा. १.२.२)।
शुकदेव
Suka
अन्य नाम व्याससूनु · महायोगी · विविक्तदृष्टिः · बादरायणिः · ब्रह्मरातः · शुकदेव · Vyasa-sunu (son of Vyasa) · समदृक्
शुकदेव — व्यास के पुत्र, भागवत-कथा के प्रथम वक्ता: जन्म से विरक्त महामुनि जिन्होंने प्रायोपविष्ट परीक्षित को सम्पूर्ण भागवत सुनाया। भा. १.४.४ में व्यास के पुत्र के रूप में वर्णित — 'महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः एकान्तमतिरुन्निद्रः'; वे हस्तिनापुर में उदासीन रूप में विचरते थे (१.४.६)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.3 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
शुकदेव का वेदव्यास के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.2.2): व्यास (द्वैपायन) शुक के पिता हैं — वे 'पुत्र!' पुकारते रहे और शुक 'व्याससूनु' कहलाते हैं (भा. १.२.२-३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। अतिरिक्त प्रमाण (SB 1.2.3): शुकदेव का वेदव्यास के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.2.3): शुक व्यास के पुत्र हैं: 'तं व्याससूनुमुपयामि' (भा. १.२.३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष। (ग्राफ-ट्रैवर्सल हेतु द्विदिश सत्ता अंकित।)
शुकदेव का वेदव्यास के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.3.41): भगवान् ऋषि ने अपने आत्मवान् पुत्र (शुक) को भागवत का अध्ययन कराया: 'तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम्' (भा. १.३.४१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
गुरु Maharaja Parikshit राजाशुकदेव का महाराज परीक्षित के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.12.28): ब्राह्मणों की भविष्यवाणी के अनुसार परीक्षित व्यास-पुत्र शुक से आत्म-तत्त्व का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करेंगे: 'जिज्ञासितात्मयाथार्थ्यो मुनेर्व्याससुतादसौ' (भा. १.१२.२८)। दिशा: शिष्य → गुरु। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
वे इतने तन्मय थे कि उसी मयता से वृक्ष भी उनके अनुसरण में लग गए: 'तन्मयतया तरवोऽभिनेदुः' (भा. १.२.२)।
स्वानुभव से उन्होंने श्रुति के सम्पूर्ण सार को — तमोऽन्ध पार करने वालों के लिए एक अध्यात्मदीप — प्रतिपादित किया: 'स्वानुभावमखिलं श्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपम्' (भा. १.२.३)।
संसारियों पर करुणा करके उन्होंने पुराण-गुह्य का उपदेश दिया: 'संसारिणां करुणयाऽह पुराणगुह्यम्' (भा. १.२.३)।
'सुतमात्मवतां वरम्... तदिदं ग्राहयामास' (भा. १.३.४१)।
'तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते' (भा. १.४.४)।
स्त्रियों ने अनुगामी पुत्र को देख आच्छादित किया — विविक्तदृष्टि के कारण (भा. १.४.५)।
'द्व्यष्टवर्षं… दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशम्' (भा. १.१९.२६–२७); 'प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्यस्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम्' (भा. १.१९.२८)।
'न लक्ष्यते ह्यवस्थानमपि गोदोहनं क्वचित्' (भा. १.१९.३९) — इसी से परीक्षित की तात्कालिकता सूचित होती है।
'परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमश्लोकलीलया गृहीतचेता' (भा. २.१.९); इसी से उन्होंने भागवत पढ़ा — 'अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम्' (भा. २.१.८)।
'शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परस्मिंश्च भवान् खलु' (भा. २.४.१०) — परीक्षित इसी योग्यता के आधार पर सृष्टि-विषयक संशय पूछते हैं।
संसारियों पर करुणा करके शुक ने पुराण-गुह्य — भा. १.१.३ के अनुसार भागवत — का उपदेश दिया: 'पुराणगुह्यम्... आह' (भा. १.२.३)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
शुक ने महाराज परीक्षित को सर्ववेदेतिहासों का सार-तत्त्व भागवत श्रावण कराया: 'स तु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम्' (भा. १.३.४२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शुक और पाण्डव राजर्षि (परीक्षित) के बीच वह संवाद हुआ जिसमें सात्वती श्रुति प्रस्तुत हुई: 'पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह संवादः समभूत्' (भा. १.४.७)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शुक ने परीक्षित के प्रश्न (भा. १.१९.३७–३८) का उत्तर आरम्भ किया: 'वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप' (भा. २.१.१); उत्तर का सार भा. २.१.५ में — 'श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्च'। दिशा: उत्तरदाता → प्रश्नकर्ता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
शुक ने परीक्षित के धारणा-विषयक प्रश्न (भा. २.१.२२) के उत्तर में विराट्पुरुष का वर्णन किया — 'स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया' (भा. २.१.२३) से आरम्भ कर भा. २.१.२४–३८ तक। प्रमाण: प्रत्यक्ष।