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शुकदेव

Suka

अन्य नाम व्याससूनु · महायोगी · विविक्तदृष्टिः · बादरायणिः · ब्रह्मरातः · शुकदेव · Vyasa-sunu (son of Vyasa) · समदृक्

अनुपेत, कृत्य-त्यागी गृह-त्याग

वे बिना दीक्षाग्रहण के, बाह्य कृत्य त्यागकर, परमतत्त्व-मग्न होकर निकल पड़े: 'यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं' (भा. १.२.२)।

तन्मय वृक्षों का अनुसरण

वे इतने तन्मय थे कि उसी मयता से वृक्ष भी उनके अनुसरण में लग गए: 'तन्मयतया तरवोऽभिनेदुः' (भा. १.२.२)।

श्रुतिसार को एक अध्यात्मदीप बनाम्

स्वानुभव से उन्होंने श्रुति के सम्पूर्ण सार को — तमोऽन्ध पार करने वालों के लिए एक अध्यात्मदीप — प्रतिपादित किया: 'स्वानुभावमखिलं श्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपम्' (भा. १.२.३)।

करुणा से पुराणगुह्य-उपदेश

संसारियों पर करुणा करके उन्होंने पुराण-गुह्य का उपदेश दिया: 'संसारिणां करुणयाऽह पुराणगुह्यम्' (भा. १.२.३)।

आत्मवतां वर — पिता-शिक्षित

'सुतमात्मवतां वरम्... तदिदं ग्राहयामास' (भा. १.३.४१)।

महायोगी, समदृक्, निर्विकल्पक, उन्निद्र

'तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते' (भा. १.४.४)।

विविक्तदृष्टि से नारियों का लज्जा-व्याकुल होना

स्त्रियों ने अनुगामी पुत्र को देख आच्छादित किया — विविक्तदृष्टि के कारण (भा. १.४.५)।

सोलह वर्ष के दिगम्बर अवधूत; लक्षण गूढ़ रहने पर भी मुनियों ने पहचाना

'द्व्यष्टवर्षं… दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशम्' (भा. १.१९.२६–२७); 'प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्यस्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम्' (भा. १.१९.२८)।

गृहस्थों के घर में गौ दुहने भर का समय भी नहीं ठहरते

'न लक्ष्यते ह्यवस्थानमपि गोदोहनं क्वचित्' (भा. १.१९.३९) — इसी से परीक्षित की तात्कालिकता सूचित होती है।

निर्गुण में स्थित होने पर भी उत्तमश्लोक की लीला से चित्त हर लिया गया

'परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमश्लोकलीलया गृहीतचेता' (भा. २.१.९); इसी से उन्होंने भागवत पढ़ा — 'अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम्' (भा. २.१.८)।

शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म दोनों में निष्णात

'शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परस्मिंश्च भवान् खलु' (भा. २.४.१०) — परीक्षित इसी योग्यता के आधार पर सृष्टि-विषयक संशय पूछते हैं।

शुकदेव — taught — श्रीमद्भागवत

संसारियों पर करुणा करके शुक ने पुराण-गुह्य — भा. १.१.३ के अनुसार भागवत — का उपदेश दिया: 'पुराणगुह्यम्... आह' (भा. १.२.३)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।