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विराट्पुरुष

Virat-Purusha

अन्य नाम वैराजः पुरुषः · विश्वमूर्तिः · विश्वतनुः · सहस्रशीर्षा · Sahasranghri · सहस्राङ्घ्रि

विराट्पुरुष अथवा वैराज पुरुष भगवान् का वह स्थूल विश्वरूप है जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही उनका शरीर है — पुरुषसूक्त की परम्परा का पुराणिक विस्तार। भा. २.१.२३–३८ में शुकदेव इसे धारणा के प्रथम आश्रय के रूप में प्रस्तुत करते हैं: जिसका मन अभी सूक्ष्म पर स्थिर नहीं हो सकता, वह इसी स्थूलतम वपु में मन लगाए। इसका विन्यास नीचे से ऊपर वर्णित है — पाताल चरण-तल (२६), नाभि नभस्तल (२७), वक्ष ज्योतिर्गण और शीर्ष सत्यलोक (२८), सूर्य चक्षु और दिन-रात पलकें (३०), मेघ केश और चन्द्रमा मन (३४), तथा ब्राह्मण मुख से शूद्र चरण तक चार वर्ण (३७)। भा. २.१.२५ के अनुसार यह सात आवरणों से युक्त अण्डकोश ही उनका शरीर है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण 2.1.23 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=332515)