Sanatan Info

बीटा AI
सिद्धांत
साझा करें
WhatsApp Facebook X / Twitter Instagram Gmail ईमेल Telegram

विराट्पुरुष

Virat-Purusha

अन्य नाम वैराजः पुरुषः · विश्वमूर्तिः · विश्वतनुः · सहस्रशीर्षा · Sahasranghri · सहस्राङ्घ्रि

सप्त-आवरण-युक्त अण्डकोश ही जिनका शरीर है

'अण्डकोशे शरीरेऽस्मिन् सप्तावरणसंयुते वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान् धारणाश्रयः' (भा. २.१.२५)।

पाताल चरण, नाभि नभस्तल, सत्यलोक शीर्ष, सूर्य चक्षु

'पातालमेतस्य हि पादमूलम्' (भा. २.१.२६); 'नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति' (भा. २.१.२७); 'सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः' (भा. २.१.२८); 'चक्षुरभूत्पतङ्गः' (भा. २.१.३०)।

स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूप माया-सृष्ट; विद्वान् दोनों को नहीं ग्रहण करते

'अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते । उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः' (भा. २.१०.३५); कर्तृत्व भी माया द्वारा आरोपित है, उसके प्रतिषेध के लिए (भा. २.१०.४५)।

कूटस्थ, आद्य और पुराण पुरुष

देवता भगवान् को 'कूटस्थ आद्यः पुरुषः पुराणः' कहकर सम्बोधित करते हैं (भा. ३.५.४९), और भा. ३.५.२६ में वही आत्मभूत पुरुष गुणमयी माया में वीर्य निहित करता है। रोस्टर में 'परः पुरुषः' कृष्ण का विशेषण है और विराट्पुरुष पृथक् सत्ता है; तृतीय समानार्थी सत्ता नहीं बनायी गयी।

सहस्र चरण, ऊरु और बाहु वाला आद्य पुरुष

भा. ३.७.२२ में विदुर उस पुरुष का वर्णन माँगते हैं 'यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् । यत्र विश्व इमे लोकाः सविकासं समासते' — जिसे आद्य पुरुष कहते हैं, सहस्र चरण, ऊरु और बाहु वाला, जिसमें ये समस्त लोक अपने विकास सहित स्थित हैं। भा. ३.७.२३ में उसी का प्राण दशविध और त्रिवृत् बताया गया है।