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विराट्पुरुष

Virat-Purusha

अन्य नाम वैराजः पुरुषः · विश्वमूर्तिः · विश्वतनुः · सहस्रशीर्षा · Sahasranghri · सहस्राङ्घ्रि

इन्द्रियों के विदीर्ण होना और लोकपालों का प्रवेश

भगवान् के अपने तेज से विराट् के तपित होने पर उसके आयतन विदीर्ण हुए (भा. ३.६.१०-११)। तदनन्तर क्रम से: मुख से अग्नि (भा. ३.६.१२), तालु से वरुण (१३), नासिका से अश्विनीकुमार (१४), नेत्र से त्वष्टा (१५), चर्म से अनिल (१६), कर्ण से दिशाएँ (१७), त्वचा से ओषधियाँ (१८), मेढ्र से क (१९), गुद से मित्र (२०), हस्त से इन्द्र (२१), चरण से विष्णु (२२), बुद्धि से वागीश (२३), हृदय से चन्द्रमा (२४), आत्मा से अभिमान (२५) और सत्त्व से महान् (२६)।