'तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः' (भा. १.३.८)।
नारद
Narada
अन्य नाम देवर्षिः · सुरपूजितः · वासवीसुतः · Deva-rishi (the divine sage)
नारद — ब्रह्मा के मानस-पुत्र, देवर्षि: त्रैलोक्य-सन्देशवाहक, वीणाधारी भक्ति-प्रचारक। भा. १.३.८ में भगवान् का तृतीय अवतार; भा. १.५-६ में व्यास को भागवत-रचना का निर्देश देते हैं। स्वयं का आत्म-चरित: पूर्व जन्म में दासी-पुत्र; माता का सर्प-दंश से निधन; उत्तरायण; निर्जन वन में पीपल तले ध्यान; हृदय में हरि का दर्शन और उसका अपहरण; भगवत्-वाणी; प्रलय में भगवान् में प्रवेश; पुनर्जन्म; देवदत्ता वीणा लेकर निरन्तर हरि-कथा गान।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.3.8 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=369178)
नारद का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 2.9.40): नारद ब्रह्मा के पुत्र और उत्तराधिकारियों में प्रियतम हैं: 'तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः' (भा. २.९.४०); ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर 'पुत्राय' भागवत कहा (भा. २.९.४३)। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
नारद का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 2.4.25): ब्रह्मा ने पूछने पर नारद से वही कहा जो साक्षात् हरि ने उनसे कहा था: 'एतदेवात्मभू राजन् नारदाय विपृच्छते वेदगर्भोऽभ्यधात्साक्षाद्यदाह हरिरात्मनः' (भा. २.४.२५)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष। अतिरिक्त प्रमाण (SB 2.7.51): नारद का ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 2.7.51): ब्रह्मा ने नारद से समस्त भागवत-तत्त्व कहकर उसे विस्तृत करने का आदेश दिया: 'इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् । सङ्ग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद्विपुलीकुरु' (भा. २.७.५१)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
गुरु Vyasa ऋषिनारद का वेदव्यास के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.5.40): नारद ने व्यास को भागवत-रचना का निर्देश दिया: 'प्राख्याहि' (भा. १.५.४०) — कृष्ण-महिमा का वर्णन करने के लिए। प्रमाण: प्रत्यक्ष। अतिरिक्त प्रमाण (SB 2.9.44): नारद का वेदव्यास के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 2.9.44): नारद ने सरस्वती के तट पर परम ब्रह्म का ध्यान करते हुए अमित-तेजस्वी व्यास से यह भागवत कहा: 'नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप… व्यासायामिततेजसे' (भा. २.९.४४)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
गुरु Yudhishthira राजानारद का युधिष्ठिर के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.13.41): नारद ने युधिष्ठिर को शोक-निवृत्ति का उपदेश दिया: 'मा कञ्चन शुचो राजन् यदीश्वरवशं जगत्' (भा. १.१३.४१) से लेकर धृतराष्ट्र की योग-गति के कथन तक; उनके वचन को हृदय में धारण कर युधिष्ठिर ने शोक त्याग दिया (भा. १.१३.६०)। दिशा: उपदेष्टा → उपदिष्ट। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
'अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम्' (भा. १.५.२३)।
'तत्रान्वहं कृष्णकथाः प्रगायतामनुग्रहेणाश्रृणवं मनोहराः' (भा. १.५.२६)।
'देवदत्तामिमां वीणां... हरिकथां गायमानश्चराम्यहम्' (भा. १.६.३३)।
भगवान् ने 'देवर्षित्वमुपेत्य' सात्वत-तन्त्र का उपदेश दिया (भा. १.३.८); देवर्षि = नारद, सर्वसम्मत पाठ। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
नारद ने नैष्कर्म्य-पथ रूप सात्वत-तन्त्र का उपदेश दिया: 'तन्त्रं सात्वतमाचष्ट' (भा. १.३.८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
देवर्षि नारद कृष्ण के गुह्यतम प्रभाव के ज्ञाता हैं (भा. १.९.१९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
'सर्पोऽदशत्पदा स्पृष्टः कृपणां कालचोदितः' (भा. १.६.९); 'प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम्' (१.६.१०)।
'पिप्पलोपस्थ आश्रितः... हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः' (भा. १.६.१६-१७)।
'सहसोत्तस्थे... नापश्यम्' (भा. १.६.१९-२०); 'गंभीरश्लक्ष्णया वाचा' (१.६.२१)।
'विविशेऽन्तरहं विभोः' (भा. १.६.३०); 'मरीचिमिश्रा ऋषयः प्राणेभ्योऽहं च जज्ञिरे' (१.६.३१)।
व्यास के आश्रम में नारद आए: 'कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम्' (भा. १.४.३२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
नारद ने ब्रह्मा से आत्मतत्त्व का ज्ञान पूछा: 'तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्त्वनिदर्शनम्' (भा. २.५.१), तथा रूप, अधिष्ठान, उपादान और पर के विषय में (भा. २.५.२)। दिशा: प्रश्नकर्ता → उत्तरदाता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।