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राजा
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युधिष्ठिर

Yudhishthira

अन्य नाम अजातशत्रुः · धर्मसुतः

तीन उत्तम अश्वमेध यज्ञ किए

'याजयित्वाश्वमेधैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकैः' (भा. १.८.६) — कृष्ण ने ये यज्ञ कराए और यश दिशाओं में फैला।

स्वजन-वध पर गहन पश्चात्ताप

'बालद्विजसुहृन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुहः न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतैः' (भा. १.८.४९); शास्त्र-वचन भी उन्हें सान्त्वना नहीं देता (भा. १.८.५०)।

राजसूय यज्ञ किया जिसमें कृष्ण को अग्र-पूजा मिली

'मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् अर्हणमुपपेद' (भा. १.९.४१)।

पितृ-पितामह के राज्य का धर्मपूर्वक शासन

'चकार राज्यं धर्मेण पितृपैतामहं विभुः' (भा. १.९.४९) — धृतराष्ट्र की अनुमति और वासुदेव के अनुमोदन से।

धर्म-राज्य में प्रकृति स्वयं समृद्ध हुई

'कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुघा मही' (भा. १.१०.४); न आधि, न व्याधि, न क्लेश — तीनों ताप अनुपस्थित रहे (भा. १.१०.६)।

कृष्ण-पाद-सेवा से समस्त कामनाओं में निःस्पृह

'निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः कृष्णपादानुसेवया' (भा. १.१२.४); देवताओं को स्पृहणीय भोग भी उन्हें आनन्द न दे सके (भा. १.१२.६)।

प्रजा पर कर-भार डाले बिना यज्ञ-धन जुटाया

'राजा लब्धधनो दध्यौ अन्यत्र करदण्डयोः' (भा. १.१२.३२); भाइयों ने अच्युत की प्रेरणा से उत्तर दिशा से धन आनीत किया (भा. १.१२.३३)।

उत्पातों से भगवान् के प्रयाण का अनुमान लगाया

दिव्य, भौम और दैहिक उत्पात (भा. १.१४.१०); शृगाली का सूर्य के सामने रोना, रक्त-वर्षा, पृथ्वी का कम्पन, गौओं का दूध न देना (भा. १.१४.१२–१९); देवर्षि नारद के कथन का स्मरण (भा. १.१४.८)।

नगर, राष्ट्र, गृह और स्वयं में अधर्म देखकर प्रस्थान किया

'पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथात्मनि विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसनाद्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात्' (भा. १.१५.३७)।

कृष्ण द्वारा राज्य में स्थापन और तीन अश्वमेध

भगवान् ने धर्मज को स्वराज्य में स्थापित किया और धर्मसुत से तीन अश्वमेध यज्ञ कराये; वे अनुजों के साथ पृथ्वी की रक्षा करते हुए कृष्ण के अनुव्रत होकर रमते रहे (भा. ३.३.१६, १८)।

युधिष्ठिर — member of — पाण्डव

युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़ा है। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।