'याजयित्वाश्वमेधैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकैः' (भा. १.८.६) — कृष्ण ने ये यज्ञ कराए और यश दिशाओं में फैला।
युधिष्ठिर
Yudhishthira
अन्य नाम अजातशत्रुः · धर्मसुतः
युधिष्ठिर का कुन्ती के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.13): युधिष्ठिर कुन्ती (पृथा) का पुत्र है: भा. १.९.१३ में भीष्म पृथा को 'बालप्रजा वधू' कहकर पाण्डवों की माता बताते हैं; भा. १.८.२३ में कुन्ती 'सहात्मजा' कहती हैं। दिशा: पुत्र → माता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
Student Narada ऋषियुधिष्ठिर का नारद के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.13.41): नारद ने युधिष्ठिर को शोक-निवृत्ति का उपदेश दिया: 'मा कञ्चन शुचो राजन् यदीश्वरवशं जगत्' (भा. १.१३.४१) से लेकर धृतराष्ट्र की योग-गति के कथन तक; उनके वचन को हृदय में धारण कर युधिष्ठिर ने शोक त्याग दिया (भा. १.१३.६०)। दिशा: उपदेष्टा → उपदिष्ट। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
Student Bhishma राजायुधिष्ठिर का भीष्म के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.27): भीष्म ने शर-शय्या पर से युधिष्ठिर को समस्त धर्मों का उपदेश दिया: दान-धर्म, राज-धर्म, मोक्ष-धर्म, स्त्री-धर्म और भगवद्-धर्म (भा. १.९.२५–२८)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पुत्र Pandu राजायुधिष्ठिर का पाण्डु के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.9.13): युधिष्ठिर पाण्डु का पुत्र है: भा. १.९.१३ 'संस्थितेऽतिरथे पाण्डौ' तथा भा. १.८.७ 'पाण्डुपुत्रान्'। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
'बालद्विजसुहृन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुहः न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतैः' (भा. १.८.४९); शास्त्र-वचन भी उन्हें सान्त्वना नहीं देता (भा. १.८.५०)।
'मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् अर्हणमुपपेद' (भा. १.९.४१)।
'चकार राज्यं धर्मेण पितृपैतामहं विभुः' (भा. १.९.४९) — धृतराष्ट्र की अनुमति और वासुदेव के अनुमोदन से।
'कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुघा मही' (भा. १.१०.४); न आधि, न व्याधि, न क्लेश — तीनों ताप अनुपस्थित रहे (भा. १.१०.६)।
'निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः कृष्णपादानुसेवया' (भा. १.१२.४); देवताओं को स्पृहणीय भोग भी उन्हें आनन्द न दे सके (भा. १.१२.६)।
'राजा लब्धधनो दध्यौ अन्यत्र करदण्डयोः' (भा. १.१२.३२); भाइयों ने अच्युत की प्रेरणा से उत्तर दिशा से धन आनीत किया (भा. १.१२.३३)।
दिव्य, भौम और दैहिक उत्पात (भा. १.१४.१०); शृगाली का सूर्य के सामने रोना, रक्त-वर्षा, पृथ्वी का कम्पन, गौओं का दूध न देना (भा. १.१४.१२–१९); देवर्षि नारद के कथन का स्मरण (भा. १.१४.८)।
'पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथात्मनि विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसनाद्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात्' (भा. १.१५.३७)।
भगवान् ने धर्मज को स्वराज्य में स्थापित किया और धर्मसुत से तीन अश्वमेध यज्ञ कराये; वे अनुजों के साथ पृथ्वी की रक्षा करते हुए कृष्ण के अनुव्रत होकर रमते रहे (भा. ३.३.१६, १८)।
युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़ा है। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
युधिष्ठिर ने ज्ञाति-द्रोह के प्रायश्चित्त हेतु तीन अश्वमेध यज्ञों से हरि की आराधना की: 'वाजिमेधैस्त्रिभिर्भीतो यज्ञैः समयजद्धरिम्' (भा. १.१२.३४)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।