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देवता
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ब्रह्मा

Brahma

अन्य नाम विरिञ्चि · धाता · आत्मयोनिः · वेदगर्भः · प्रपितामहः · Svayambhu · Aja (the unborn) · Abja-sambhuta (lotus-born)

हृदय में वेद-प्राप्त आदिकवि

वे आदिकवि हैं जिनके हृदय में भगवान् ने ब्रह्म का उपदेश दिया: 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' (भा. १.१.१)।

सृष्टि-कार्य हेतु 'विरिञ्चि' नाम

एक पुरुष के गुण-धारण में सृष्टि-कार्य का नाम विरिञ्चि है: 'स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः' (भा. १.२.२३)।

जगद्गुरु कहलाने का अस्वीकार — वह भी उन्हीं की माया

'यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम्' (भा. २.५.१२); 'येन स्वरोचिषा विश्वं रोचितं रोचयाम्यहम्' (भा. २.५.११) — जैसे सूर्य और चन्द्र, वैसे ही ब्रह्मा भी परायी दीप्ति से दीप्त हैं।

समाहित योग से भी उन्हें न पा सका जिनसे स्वयं उत्पन्न है

'सोऽहं समाम्नायमयस्तपोमयः प्रजापतीनामभिवन्दितः पतिः । आस्थाय योगं निपुणं समाहितस्तं नाध्यगच्छं यत आत्मसम्भवः' (भा. २.६.३४); 'न मैं, न आप, न वामदेव उनकी गति जानते हैं' (भा. २.६.३६)।

उत्कण्ठित हृदय से हरि को धारण करने के कारण वाणी कभी मिथ्या नहीं

'न भारती मेऽङ्ग मृषोपलक्ष्यते… यन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरिः' (भा. २.६.३३) — प्रामाणिकता का आधार पद नहीं, भक्ति है।

जल में सुना दो अक्षर का वचन 'तप', दो बार कहा हुआ

'स चिन्तयन्द्व्यक्षरमेकदाम्भसि उपाशृणोद्द्विर्गदितं वचो विभुः । स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशम्' (भा. २.९.६) — स्पर्श वर्णों का सोलहवाँ 'त' और इक्कीसवाँ 'प'; वक्ता कोई न दिखा (भा. २.९.७)।

द्विपरार्ध आयु; पूर्व परार्ध व्यतीत

भा. ३.११.३२ में ब्रह्मा का परम आयु सौ वर्ष बताया गया है, और भा. ३.११.३३ में उसका अर्ध 'परार्ध' कहा गया है: 'पूर्वः परार्धोऽपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते'। भा. ३.११.३७ में इस द्विपरार्ध को अव्याकृत अनन्त के लिये 'निमेष' कहकर उपचारित किया गया है।