वे आदिकवि हैं जिनके हृदय में भगवान् ने ब्रह्म का उपदेश दिया: 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' (भा. १.१.१)।
ब्रह्मा
Brahma
अन्य नाम विरिञ्चि · धाता · आत्मयोनिः · वेदगर्भः · प्रपितामहः · Svayambhu · Aja (the unborn) · Abja-sambhuta (lotus-born)
ब्रह्मा हिन्दू त्रिमूर्ति के प्रथम देव हैं — सृष्टि के रचयिता, जो विष्णु (स्थिति) और शिव (लय) के साथ ब्रह्माण्डीय त्रिक बनाते हैं; परम्परा में इनका जन्म विष्णु की नाभि-कमल से माना गया है। भागवत के संसाधित पदों में ये 'आदिकवि' — प्रथम ऋषि — हैं जिनके हृदय में भगवान् ने स्वयं ब्रह्मरूप वेदज्ञान का उपदेश दिया: 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' (भा. १.१.१)। भा. १.२.२३ में एक परम पुरुष की गुण-व्यवस्था में इन्हें सृष्टि-कार्य से जुड़ा 'विरिञ्चि' नाम मिला है। भा. १.१.२२ में धाता (सृष्टिकर्ता) द्वारा सूत को कलि-सागर का कर्णधार नियुक्त किए जाने का कथन है (प्रबल साक्ष्य-व्याख्या)।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.1.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110172)
ब्रह्मा का नारद के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 2.4.25): ब्रह्मा ने पूछने पर नारद से वही कहा जो साक्षात् हरि ने उनसे कहा था: 'एतदेवात्मभू राजन् नारदाय विपृच्छते वेदगर्भोऽभ्यधात्साक्षाद्यदाह हरिरात्मनः' (भा. २.४.२५)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष। अतिरिक्त प्रमाण (SB 2.7.51): ब्रह्मा का नारद के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 2.7.51): ब्रह्मा ने नारद से समस्त भागवत-तत्त्व कहकर उसे विस्तृत करने का आदेश दिया: 'इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् । सङ्ग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद्विपुलीकुरु' (भा. २.७.५१)। दिशा: उपदेष्टा → शिष्य। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ब्रह्मा का नारद के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 2.9.40): नारद ब्रह्मा के पुत्र और उत्तराधिकारियों में प्रियतम हैं: 'तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः' (भा. २.९.४०); ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर 'पुत्राय' भागवत कहा (भा. २.९.४३)। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पिता Shiva देवताब्रह्मा का शिव के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.7): भा. ३.१२.७ में प्रजापति ब्रह्मा की भृकुटियों के मध्य से उनका मन्यु कुमार नीललोहित उत्पन्न हुआ: 'भ्रुवोर्मध्यात्प्रजापतेः । सद्योऽजायत तन्मन्युः कुमारो नीललोहितः'।
पिता Sanaka ऋषिब्रह्मा का सनक के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.4): भा. ३.१२.४ में आत्मभू (ब्रह्मा) ने सनक आदि मुनियों की सृष्टि की: 'सनकं च सनन्दं च सनातनमथात्मभूः'।
पिता Marichi ऋषिब्रह्मा का मरीचि के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में मरीचि को ब्रह्मा के दस पुत्रों में प्रथम गिना गया है: 'मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः'; ३.१२.२४ में 'मरीचिर्मनसोऽभवत्' — वे मन से उत्पन्न हुए।
Student Krishna देवताब्रह्मा का श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.1.1): भगवान् ने आदिकवि (ब्रह्मा) के हृदय में ब्रह्म-रूप वेदज्ञान का उपदेश किया। संस्कृत: 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' (भा. १.१.१) — कर्ता 'यः' (भगवान्, 'तेने' क्रिया), द्वितीया 'आदिकवये' = प्राप्तकर्ता। प्रमाण: प्रत्यक्ष (आदिकवि = ब्रह्मा — सर्वमान्य परम्परा)। दिशा सत्यापित: भगवान् → ब्रह्मा। अतिरिक्त प्रमाण (SB 2.2.32): ब्रह्मा का श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 2.2.32): भगवान् वासुदेव ने आराधित और प्रसन्न होकर पूर्वकाल में ब्रह्मा से ये दोनों सनातन मार्ग कहे: 'ये वै पुरा ब्रह्मण आह तुष्ट आराधितो भगवान् वासुदेवः' (भा. २.२.३२)। दिशा: उपदेष्टा → श्रोता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पिता Atri ऋषिब्रह्मा का अत्रि के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में अत्रि ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२४ में 'अक्ष्णोरत्रिः' — वे नेत्र से उत्पन्न हुए।
पिता Sananda ऋषिब्रह्मा का सनन्द के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.4): भा. ३.१२.४ में आत्मभू (ब्रह्मा) ने सनन्द आदि मुनियों की सृष्टि की।
पिता Angiras ऋषिब्रह्मा का अङ्गिरा के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में अङ्गिरा ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२४ में 'अङ्गिरा मुखतः' — वे मुख से उत्पन्न हुए।
पिता Sanatana ऋषिब्रह्मा का सनातन के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.4): भा. ३.१२.४ में आत्मभू (ब्रह्मा) ने सनातन आदि मुनियों की सृष्टि की।
पिता Pulastya ऋषिब्रह्मा का पुलस्त्य के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में पुलस्त्य ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२४ में 'पुलस्त्यः कर्णयोः ऋषिः' — वे दोनों कानों से उत्पन्न हुए।
पिता Sanatkumara ऋषिब्रह्मा का सनत्कुमार के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.4): भा. ३.१२.४ में सनत्कुमार को आत्मभू (ब्रह्मा) द्वारा सृजित चार मुनियों में गिना गया है: 'सनत्कुमारं च मुनीन्निष्क्रियानूर्ध्वरेतसः'।
पिता Pulaha ऋषिब्रह्मा का पुलह के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में पुलह ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२४ में 'पुलहो नाभितो जज्ञे' — वे नाभि से उत्पन्न हुए।
पिता Kratu ऋषिब्रह्मा का क्रतु के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में क्रतु ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२३ में 'करात्क्रतुः' — वे हाथ से उत्पन्न हुए।
पिता Bhrigu ऋषिब्रह्मा का भृगु के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में भृगु ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२३ में 'भृगुस्त्वचि' — वे त्वचा से उत्पन्न हुए।
पिता Vasishtha ऋषिब्रह्मा का वसिष्ठ के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में वसिष्ठ ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२३ में 'प्राणाद्वसिष्ठः सञ्जातः' — वे प्राण से उत्पन्न हुए।
पिता Daksha देवताब्रह्मा का दक्ष के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 3.12.22): भा. ३.१२.२२ में दक्ष ब्रह्मा के दस पुत्रों में गिने गये हैं; ३.१२.२३ में 'दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुवः' — वे स्वयम्भू के अङ्गुष्ठ से उत्पन्न हुए।
एक पुरुष के गुण-धारण में सृष्टि-कार्य का नाम विरिञ्चि है: 'स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः' (भा. १.२.२३)।
'यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम्' (भा. २.५.१२); 'येन स्वरोचिषा विश्वं रोचितं रोचयाम्यहम्' (भा. २.५.११) — जैसे सूर्य और चन्द्र, वैसे ही ब्रह्मा भी परायी दीप्ति से दीप्त हैं।
'सोऽहं समाम्नायमयस्तपोमयः प्रजापतीनामभिवन्दितः पतिः । आस्थाय योगं निपुणं समाहितस्तं नाध्यगच्छं यत आत्मसम्भवः' (भा. २.६.३४); 'न मैं, न आप, न वामदेव उनकी गति जानते हैं' (भा. २.६.३६)।
'न भारती मेऽङ्ग मृषोपलक्ष्यते… यन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरिः' (भा. २.६.३३) — प्रामाणिकता का आधार पद नहीं, भक्ति है।
'स चिन्तयन्द्व्यक्षरमेकदाम्भसि उपाशृणोद्द्विर्गदितं वचो विभुः । स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशम्' (भा. २.९.६) — स्पर्श वर्णों का सोलहवाँ 'त' और इक्कीसवाँ 'प'; वक्ता कोई न दिखा (भा. २.९.७)।
भा. ३.११.३२ में ब्रह्मा का परम आयु सौ वर्ष बताया गया है, और भा. ३.११.३३ में उसका अर्ध 'परार्ध' कहा गया है: 'पूर्वः परार्धोऽपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते'। भा. ३.११.३७ में इस द्विपरार्ध को अव्याकृत अनन्त के लिये 'निमेष' कहकर उपचारित किया गया है।
भा. ३.८.१५-१६ में वेदमय विधाता लोक-पद्म में स्वयम्भू होते हैं और चार मुख प्राप्त करते हैं। भा. ३.८.१८ में वे चार प्रश्न पूछते हैं — यह कौन है, मैं कौन हूँ, यह अब्ज कहाँ से, और नीचे क्या है। भा. ३.८.१९ में अन्वेषण विफल होता है; भा. ३.८.२० में त्रिनेमि काल का उदय होता है। भा. ३.८.२१-२२ में वे पुनः अपने स्थान पर आकर समाधि-योग से, पुरुषायुषा भर, अन्तर्हृदय में उसे देखते हैं जो पूर्व में नहीं देखा था।
भा. ३.९.१-२५ में ब्रह्मा भगवान् की स्तुति करते हैं, और स्वीकार करते हैं कि देहधारी उनकी गति को नहीं जान पाते (३.९.१) और वे स्वयं भी उनसे भयभीत हैं (३.९.१८)। भा. ३.९.२६-२८ में वे खिन्न के समान विराम करते हैं और भगवान् अगाध वाणी से उनका कश्मल शमन करते हैं। भा. ३.९.२९-४३ में भगवान् उन्हें तप और विद्या में स्थित होने, और पूर्ववत् प्रजाओं की सृष्टि करने का आदेश देते हैं। भा. ३.९.४४ में भगवान् स्वयं प्रकट होकर यह रूप तिरोहित कर देते हैं।
भा. ३.१०.४ में विरिञ्चि दिव्य वर्षशत तक तप करते हैं, अपने आत्मा में आत्मा को आविष्ट कर, जैसा अज भगवान् ने कहा था। भा. ३.१०.६ में बढ़ते तप और आत्म-संस्थ विद्या से वे वायु को जल सहित निपात करते हैं। भा. ३.१०.८ में भगवत्-कर्म से प्रेरित होकर वे पद्मकोश में प्रवेश कर एक को उरुधा विभाजित करते हैं — त्रिधा भाव्य और द्विसप्तधा।
ब्रह्मा ने इसी धारणा से प्रसन्न भगवान् से अपनी नष्ट स्मृति पुनः प्राप्त की और पूर्ववत् सृष्टि की: 'एवं पुरा धारणयात्मयोनिर्नष्टां स्मृतिं प्रत्यवरुध्य तुष्टात्' (भा. २.२.१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ब्रह्मा स्वयं सृष्ट होकर द्रष्टा ईश की ईक्षा से ही प्रेरित होकर सृष्टि करते हैं: 'तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मनः सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदितः' (भा. २.५.१७); तथा 'सृजामि तन्नियुक्तोऽहम्' (भा. २.६.३१)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ब्रह्मा महात्मा पुरुष की नाभि-कमल से उत्पन्न हुए: 'यदास्य नाभ्यान्नलिनादहमासं महात्मनः' (भा. २.६.२२); और उन्हें यज्ञ की सामग्री पुरुष के अवयवों के अतिरिक्त कहीं न मिली। दिशा: उत्पन्न → उद्गम। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
सहस्र दिव्य वर्षों के तप से सन्तुष्ट भगवान् ने ब्रह्मा को अपना परम लोक दिखाया: 'तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः सन्दर्शयामास परं न यत्परम्' (भा. २.९.९); वहाँ उन्होंने चतुर्भुज रूप का दर्शन किया (भा. २.९.१४–१६)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।