'प्रायोपविष्टं गङ्गायां परीतं परमर्षिभिः कृष्णे स्वधामोपगते' (भा. १.३.४३)।
महाराज परीक्षित
Maharaja Parikshit
अन्य नाम सम्राट् · भागवतोत्तमः · विष्णुरातः · औत्तरेयः · मानवर्धनः · विष्णुरात · Vishnurata
महाराज परीक्षित का पाण्डु के साथ सम्बन्ध: वंशज। स्रोत प्रमाण (SB 1.12.12): परीक्षित पाण्डु का वंशधर है: 'जज्ञे वंशधरः पाण्डोः भूयः पाण्डुरिवौजसा' (भा. १.१२.१२) — तेज में पुनः पाण्डु के समान। दिशा: वंशज → पूर्वज। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
Husband Iravati Humanमहाराज परीक्षित का इरावती के साथ सम्बन्ध: पति। स्रोत प्रमाण (SB 1.16.2): परीक्षित ने उत्तर की कन्या इरावती से विवाह किया: 'स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम्' (भा. १.१६.२)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पुत्र Abhimanyu राजामहाराज परीक्षित का अभिमन्यु के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.4.9): परीक्षित अभिमन्यु के पुत्र हैं: 'अभिमन्युसुतं' (भा. १.४.९)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
Student Suka ऋषिमहाराज परीक्षित का शुकदेव के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.12.28): ब्राह्मणों की भविष्यवाणी के अनुसार परीक्षित व्यास-पुत्र शुक से आत्म-तत्त्व का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करेंगे: 'जिज्ञासितात्मयाथार्थ्यो मुनेर्व्याससुतादसौ' (भा. १.१२.२८)। दिशा: शिष्य → गुरु। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पिता Janamejaya राजामहाराज परीक्षित का जनमेजय के साथ सम्बन्ध: पिता। स्रोत प्रमाण (SB 1.16.2): जनमेजय परीक्षित का पुत्र है: 'जनमेजयादींश्चतुरस्तस्यामुत्पादयत्सुतान्' (भा. १.१६.२) — इरावती से चार पुत्रों में प्रथम। दिशा: पुत्र → पिता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पुत्र Uttara Humanमहाराज परीक्षित का उत्तरा के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 1.8.14): परीक्षित उत्तरा का पुत्र है: भा. १.८.१४ में हरि ने उत्तरा के गर्भ की रक्षा की और वही गर्भ परीक्षित के रूप में जन्मा। दिशा: पुत्र → माता। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
'अङ्गुष्ठमात्रममलं स्फुरत्पुरटमौलिनम्… गदापाणिम्' (भा. १.१२.८–९); भगवान् ने गदा से अस्त्र-तेज को सूर्य-सा कुहरा नष्ट किया (भा. १.१२.१०)।
'पूर्वं दृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह' (भा. १.१२.३०) — यही 'परीक्षित्' नाम का निर्वचन है।
'रातो वोऽनुग्रहार्थाय विष्णुना प्रभविष्णुना… तस्मान्नाम्ना विष्णुरात इति' (भा. १.१२.१६–१७); महाभागवत होने की भविष्यवाणी।
'ततः परीक्षिद्द्विजवर्यशिक्षया महीं महाभागवतः शशास ह' (भा. १.१६.१) — जन्म के समय जातक-विशारदों की भविष्यवाणी (भा. १.१२.१९–२८) के अनुरूप।
'आजहाराश्वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान् शारद्वतं गुरुं कृत्वा' (भा. १.१६.३) — जहाँ देवता प्रत्यक्ष दिखाई देते थे।
'शरण्यो नावधीच्छ्लोक्यः' (भा. १.१७.३०); कलि ने स्वयं स्थान माँगा और उसके अनुशासन में रहा (भा. १.१७.३७, ४०) — अधर्म का उन्मूलन नहीं, नियन्त्रण।
'वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान्… प्रतिसन्दधे आश्वास्य महीं च समवर्धयत्' (भा. १.१७.४२)।
'इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः' (भा. १.१७.४५); 'औत्तरेयेण दत्तानि' (भा. १.१७.४०)।
'न सम्मुमोहोरुभयाद् भगवत्यर्पिताशयः' (भा. १.१८.२); उन्होंने आसक्ति त्यागकर गङ्गा-तट पर शरीर छोड़ा (भा. १.१८.३)।
'नानुद्वेष्टि कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक्' (भा. १.१८.७) — इस युग में शुभ कर्म शीघ्र सिद्ध होते हैं।
'अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः… मत्सरो मन्युरेव च' (भा. १.१८.२९); शमीक ने भी कहा — 'क्षुत्तृट्श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति' (भा. १.१८.४६)।
'स साधु मेने न चिरेण तक्षकानलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम्' (भा. १.१९.४); 'निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो' (भा. १.१९.१४) — शाप को ईश्वर का अनुग्रह पढ़ा।
'पुनश्च भूयाद्भगवत्यनन्ते रतिः प्रसङ्गश्च तदाश्रयेषु… मैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्यः' (भा. १.१९.१६)।
'द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः' (भा. १.१९.१५)।
'तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधिः' (भा. २.१.१४); खट्वाङ्ग के एक मुहूर्त (भा. २.१.१३) की तुलना में यह पर्याप्त बताया गया।
'बालक्रीडनकैः क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे' (भा. २.३.१५) — गर्भ में हुए दर्शन (भा. १.१२.७–११) का ही अनुवर्तन।
'आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । राज्ये चाविकले नित्यं विरूढां ममतां जहौ' (भा. २.४.२); त्रैवर्गिक कर्म का संन्यास कर वासुदेव में दृढ़ आत्मभाव (भा. २.४.४)।
'न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्ननशनादमी । पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद्द्विजात्' (भा. २.८.२६)।
परीक्षित 'पाण्डूनां मानवर्धनः' हैं (भा. १.४.१०)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
परीक्षित परमर्षियों से घिरे गंगा-तट पर प्रायोपवेशन कर बैठे: 'प्रायोपविष्टं गङ्गायां परीतं परमर्षिभिः' (भा. १.३.४३)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने गर्भ में ही अङ्गुष्ठ-मात्र चतुर्भुज पुरुष का दर्शन किया, जो गदा से ब्रह्मास्त्र का तेज नष्ट कर रहे थे: 'ददर्श पुरुषं कञ्चिद् दह्यमानोऽस्त्रतेजसा' (भा. १.१२.७–१०)। इसी दर्शन के अनुध्यान से उनका नाम 'परीक्षित्' पड़ा (भा. १.१२.३०)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी की कि द्विज-पुत्र के शाप से भेजे गए तक्षक से परीक्षित की मृत्यु होगी: 'तक्षकादात्मनो मृत्युं द्विजपुत्रोपसर्जितात्' (भा. १.१२.२७)। दिशा: वध्य → वधकर्ता। प्रमाण: प्रत्यक्ष (भविष्य-कथन)।
ब्राह्मणों ने कहा कि परीक्षित पृथ्वी और धर्म के लिए कलि का निग्रह करेंगे: 'निग्रहीता कलेरेष भुवो धर्मस्य कारणात्' (भा. १.१२.२६) — यह भा. १.१६–१७ में फलित होता है। प्रमाण: प्रत्यक्ष (भविष्य-कथन)।
युधिष्ठिर ने परीक्षित को समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का स्वामी बनाकर हस्तिनापुर में अभिषिक्त किया: 'तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये' (भा. १.१५.३८)। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने दिग्विजय के समय राजा का वेश धारण किए कलि को बल से पकड़ा, जो गौ-बैल के जोड़े को पैर से मार रहा था: 'निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्वचित्' (भा. १.१६.४) — भा. १.१२.२६ की भविष्यवाणी का फल। दिशा: निग्रहकर्ता → निगृहीत। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने शरणागत कलि का वध नहीं किया: 'पतितं पादयोर्वीरः कृपया दीनवत्सलः शरण्यो नावधीत्' (भा. १.१७.३०) — शरणागत का वध वर्जित है (तुलना: भा. १.७.३६)। दिशा: क्षमा करने वाला → क्षमा-प्राप्त। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने धर्म-रूप वृष के नष्ट तीन पाद — तप, शौच और दया — पुनः जोड़ दिए: 'वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति प्रतिसन्दधे' (भा. १.१७.४२)। दिशा: पुनःस्थापक → पुनःस्थापित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने पृथ्वी को आश्वस्त कर समृद्ध किया: 'आश्वास्य महीं च समवर्धयत्' (भा. १.१७.४२); पूर्व में 'मा रोदीरम्ब भद्रं ते' (भा. १.१७.९)। दिशा: आश्वासक → आश्वस्त। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने क्षुधा-तृषा से पीड़ित होकर समाधिस्थ शमीक के कन्धे पर मरा सर्प रख दिया: 'स तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा… निधाय पुरमागत्' (भा. १.१८.३०); यह क्रोध उनमें 'अभूतपूर्व' था (भा. १.१८.२९)। दिशा: अपराधी → अपकृत। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने शुक से वह प्रश्न पूछा जिसका उत्तर सम्पूर्ण भागवत है: 'पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा' (भा. १.१९.३७); तथा 'यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो' (भा. १.१९.३८)। दिशा: प्रश्नकर्ता → उत्तरदाता। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
परीक्षित ने गङ्गा के दक्षिण तट पर प्रायोपवेशन किया: 'उपाविशत्प्रायममर्त्यनद्याम्' (भा. १.१९.५); 'उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते समुद्रपत्न्याः' (भा. १.१९.१७) — पुत्र पर भार सौंपकर। प्रमाण: प्रत्यक्ष।