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महाराज परीक्षित

Maharaja Parikshit

अन्य नाम सम्राट् · भागवतोत्तमः · विष्णुरातः · औत्तरेयः · मानवर्धनः · विष्णुरात · Vishnurata

कृष्ण-गमनोत्तर गंगा-तट पर परमर्षि-परिवृत प्रायोपविष्ट महाराज

'प्रायोपविष्टं गङ्गायां परीतं परमर्षिभिः कृष्णे स्वधामोपगते' (भा. १.३.४३)।

गर्भ में ही अङ्गुष्ठ-मात्र चतुर्भुज भगवान् का दर्शन

'अङ्गुष्ठमात्रममलं स्फुरत्पुरटमौलिनम्… गदापाणिम्' (भा. १.१२.८–९); भगवान् ने गदा से अस्त्र-तेज को सूर्य-सा कुहरा नष्ट किया (भा. १.१२.१०)।

नाम का अर्थ — गर्भ-दृष्ट पुरुष को सबमें खोजने वाला

'पूर्वं दृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह' (भा. १.१२.३०) — यही 'परीक्षित्' नाम का निर्वचन है।

विष्णुरात — विष्णु द्वारा दिया गया

'रातो वोऽनुग्रहार्थाय विष्णुना प्रभविष्णुना… तस्मान्नाम्ना विष्णुरात इति' (भा. १.१२.१६–१७); महाभागवत होने की भविष्यवाणी।

महाभागवत रूप में ब्राह्मणों की शिक्षा से शासन

'ततः परीक्षिद्द्विजवर्यशिक्षया महीं महाभागवतः शशास ह' (भा. १.१६.१) — जन्म के समय जातक-विशारदों की भविष्यवाणी (भा. १.१२.१९–२८) के अनुरूप।

गङ्गा-तट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए

'आजहाराश्वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान् शारद्वतं गुरुं कृत्वा' (भा. १.१६.३) — जहाँ देवता प्रत्यक्ष दिखाई देते थे।

शरणागत कलि को अभय देकर नियत स्थान दिए

'शरण्यो नावधीच्छ्लोक्यः' (भा. १.१७.३०); कलि ने स्वयं स्थान माँगा और उसके अनुशासन में रहा (भा. १.१७.३७, ४०) — अधर्म का उन्मूलन नहीं, नियन्त्रण।

धर्म के तीन पाद पुनः स्थापित किए और पृथ्वी को समृद्ध किया

'वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान्… प्रतिसन्दधे आश्वास्य महीं च समवर्धयत्' (भा. १.१७.४२)।

अभिमन्यु-पुत्र और उत्तरा-पुत्र — दोनों नामों से स्पष्ट

'इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः' (भा. १.१७.४५); 'औत्तरेयेण दत्तानि' (भा. १.१७.४०)।

तक्षक के भय से भी मोहित नहीं — चित्त भगवान् में अर्पित

'न सम्मुमोहोरुभयाद् भगवत्यर्पिताशयः' (भा. १.१८.२); उन्होंने आसक्ति त्यागकर गङ्गा-तट पर शरीर छोड़ा (भा. १.१८.३)।

कलि से द्वेष नहीं किया — भ्रमर की भाँति सार ग्रहण

'नानुद्वेष्टि कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक्' (भा. १.१८.७) — इस युग में शुभ कर्म शीघ्र सिद्ध होते हैं।

क्षुधा-तृषा से पीड़ित होकर ही अपराध हुआ; क्रोध अभूतपूर्व था

'अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः… मत्सरो मन्युरेव च' (भा. १.१८.२९); शमीक ने भी कहा — 'क्षुत्तृट्श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति' (भा. १.१८.४६)।

शाप को वैराग्य का कारण मानकर स्वागत किया

'स साधु मेने न चिरेण तक्षकानलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम्' (भा. १.१९.४); 'निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो' (भा. १.१९.१४) — शाप को ईश्वर का अनुग्रह पढ़ा।

अन्तिम प्रार्थना — मोक्ष नहीं, अपितु प्रत्येक जन्म में भक्ति और सत्सङ्ग

'पुनश्च भूयाद्भगवत्यनन्ते रतिः प्रसङ्गश्च तदाश्रयेषु… मैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्यः' (भा. १.१९.१६)।

तक्षक भले डँसे — केवल विष्णु-गाथाएँ गाई जाएँ

'द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः' (भा. १.१९.१५)।

सात दिन की जीवन-अवधि — सम्पूर्ण भागवत का काल-फलक

'तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधिः' (भा. २.१.१४); खट्वाङ्ग के एक मुहूर्त (भा. २.१.१३) की तुलना में यह पर्याप्त बताया गया।

बाल्यावस्था में खिलौनों से भी कृष्ण की ही क्रीडा का अनुकरण

'बालक्रीडनकैः क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे' (भा. २.३.१५) — गर्भ में हुए दर्शन (भा. १.१२.७–११) का ही अनुवर्तन।

देह, स्त्री, पुत्र, धन और अखण्ड राज्य तक की ममता का त्याग

'आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । राज्ये चाविकले नित्यं विरूढां ममतां जहौ' (भा. २.४.२); त्रैवर्गिक कर्म का संन्यास कर वासुदेव में दृढ़ आत्मभाव (भा. २.४.४)।

अनशन से प्राण नहीं जाते — अच्युत का पीयूष पी रहे हैं

'न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्ननशनादमी । पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद्द्विजात्' (भा. २.८.२६)।

महाराज परीक्षित — member of — पाण्डव

परीक्षित 'पाण्डूनां मानवर्धनः' हैं (भा. १.४.१०)। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।