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विदुर

Vidura

अन्य नाम क्षत्ता

यदु-कुल के विनाश का समाचार करुणावश छिपाया

'सर्वं तत् समवर्णयत्… विना यदुकुलक्षयम्' (भा. १.१३.१२); 'सकरुणो दुःखितान् द्रष्टुमक्षमः' (भा. १.१३.१३) — उन्हें दुःखी देखने में असमर्थ।

स्वयं तीर्थ-स्वरूप भागवत

'भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता' (भा. १.१३.१०) — हृदयस्थ गदाधर के कारण।

अमलात्मा — निर्मल आत्मा वाले

श्रीशुक विदुर को 'अमलात्मा' कहते हैं: 'न ह्यल्पार्थोदयस्तस्य विदुरस्यामलात्मनः' (भा. ३.१.४)।

उपाख्यान में 'क्षत्ता' नाम से सम्बोधित

सम्पूर्ण प्रसंग में विदुर के लिये 'क्षत्ता' शब्द का प्रयोग है: 'क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन' (भा. ३.१.१); 'क्षत्ता सकर्णानुजसौबलेन' (३.१.१४)।

सुहृदों के वध का शोक ज्ञान से शमित करना

उद्धव से अपने सुहृदों का दुःसह वध सुनकर, बुद्धिमान् क्षत्ता ने ज्ञान के द्वारा उठ आये शोक को शमित कर लिया: 'ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुधः' (भा. ३.४.२३)।

मैत्रेय से सोलह प्रश्न और कृष्ण-कथा की चाह

विदुर स्वीकार करते हैं कि परा और अवरा के भगवद्-व्रत उन्होंने व्यास के मुख से बारम्बार सुने, किन्तु कृष्ण-कथा के अमृत-प्रवाह के बिना तृप्ति नहीं हुई: 'अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौघात्' (भा. ३.५.१०)। वे कहते हैं कि सुनते रहने पर भी मन तृप्त नहीं होता (भा. ३.५.७)।

माया और ईश्वर के सम्बन्ध पर प्रश्न

विदुर पूछते हैं कि चिन्मात्र, अविकारी और निर्गुण भगवान् के गुण और क्रियाएँ लीला से भी कैसे जुड़ सकती हैं: 'ब्रह्मन् कथं भगवतश्चिन्मात्रस्याविकारिणः । लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणाः क्रियाः' (भा. ३.७.२)। वे बालक के उद्यम का दृष्टान्त स्वयं उठाकर उसकी सीमा भी बताते हैं (भा. ३.७.३), और अन्त में इसे अज्ञान-संकट कहकर निवारण माँगते हैं (भा. ३.७.७)।

मैत्रेय से चौबीस विषयों की याचना

भा. ३.७.२१-४१ में विदुर मैत्रेय से सृष्टि-क्रम की एक लम्बी सूची माँगते हैं: महदादि से विराट् की उत्पत्ति, प्रजापति, सर्ग और अनुसर्ग, मनु और मन्वन्तर, वंश और वंशानुचरित, लोक, चार प्रकार की योनियाँ, गुणावतार, वर्णाश्रम-विभाग, ऋषि और वेद, यज्ञ, योग, सांख्य, पाखण्ड-पथ, जीव की गतियाँ, चार पुरुषार्थ, वार्ता और दण्डनीति, श्राद्ध, पितृ, ग्रह-नक्षत्र-तारा, कालावयव, दान, तप, इष्ट-पूर्त, प्रवास और आपद्-धर्म, तत्त्वों का प्रतिसंक्रम, और स्वतः उत्पन्न ज्ञान, भक्ति और वैराग्य। वे इसका औचित्य गुरु-शिष्य-सम्बन्ध से जोड़ते हैं (भा. ३.७.३६)।

ब्रह्मा की सृष्टि और काल-लक्षण पर प्रश्न

भा. ३.१०.१-२ में विदुर पूछते हैं कि भगवान् के अन्तर्हित होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने प्रजाओं की कितने प्रकार से सृष्टि की — दैहिकी और मानसी — और माँग करते हैं कि उनके समस्त संशयों का छेदन हो। भा. ३.१०.१० में वे अद्भुत-कर्म वाले बहु-रूप हरि का उल्लेख कर कालाख्य लक्षण पूछते हैं।

विदुर — incarnation of — यम

विदुर यम के अवतार हैं: 'यावद्दधार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः' (भा. १.१३.१५) — माण्डव्य के शाप से यम ने सौ वर्ष शूद्रत्व धारण किया, उसी अवधि में अर्यमा ने दण्ड-भार सँभाला। दिशा: अवतार → मूल। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।