'सर्वं तत् समवर्णयत्… विना यदुकुलक्षयम्' (भा. १.१३.१२); 'सकरुणो दुःखितान् द्रष्टुमक्षमः' (भा. १.१३.१३) — उन्हें दुःखी देखने में असमर्थ।
विदुर
Vidura
अन्य नाम क्षत्ता
विदुर (क्षत्ता) — व्यास और अम्बिका की दासी से उत्पन्न, धृतराष्ट्र और पाण्डु के अनुज; माण्डव्य ऋषि के शाप के कारण शूद्र-योनि में जन्मे यमराज के अवतार माने जाते हैं (भा. १.१३.१५)। कुरु-सभा में धर्म और नीति के एकमात्र निर्भीक प्रवक्ता; उन्होंने लाक्षागृह की सूचना देकर पाण्डवों के प्राण बचाए (भा. १.१३.८, ३४)। दुर्योधन के अपमान पर हस्तिनापुर छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकले और मैत्रेय से आत्म-ज्ञान प्राप्त किया (भा. १.१३.१)। भा. १.१३ में लौटकर उन्होंने धृतराष्ट्र को कठोर किन्तु करुणापूर्ण उपदेश देकर गृह-त्याग के लिए प्रेरित किया। तृतीय स्कन्ध का 'विदुर-मैत्रेय संवाद' इन्हीं के प्रश्नों पर आधारित है।
श्रीमद्भागवतमहापुराण 1.13.1 — संस्कृत विकिस्रोत (स्थिर oldid=110184)
विदुर का धृतराष्ट्र के साथ सम्बन्ध: भाई। स्रोत प्रमाण (SB 1.13.29): विदुर धृतराष्ट्र के अनुज हैं: 'एवं राजा विदुरेणानुजेन' (भा. १.१३.२९) तथा 'भ्रातुर्ज्येष्ठस्य श्रेयस्कृत्' (भा. १.१३.१४) — विदुर ज्येष्ठ भ्राता का कल्याण करते हैं। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
विदुर का धृतराष्ट्र के साथ सम्बन्ध: शिक्षक। स्रोत प्रमाण (SB 1.13.18): विदुर ने धृतराष्ट्र को गृह-त्याग का उपदेश दिया: 'राजन् निर्गम्यतां शीघ्रं पश्येदं भयमागतम्' (भा. १.१३.१८) से लेकर 'अथोदीचीं दिशं यातु' (भा. १.१३.२८) तक; इसी से प्रबोधित होकर वे निकल पड़े (भा. १.१३.२९)। दिशा: उपदेष्टा → उपदिष्ट। प्रमाण: प्रत्यक्ष।
पुत्र Mitra देवताविदुर का मित्र के साथ सम्बन्ध: पुत्र। स्रोत प्रमाण (SB 3.7.26): मैत्रेय विदुर को सम्बोधित करते हुए उन लोकों का वर्णन माँगते हैं 'जहाँ मित्र के पुत्र निवास करते हैं': 'उपर्यधश्च ये लोका भूमेर्मित्रात्मजासते' (भा. ३.७.२६)। 'मित्रात्मज' शब्द विदुर को मित्र का पुत्र कहता है।
Student Maitreya ऋषिविदुर का मैत्रेय के साथ सम्बन्ध: शिष्य। स्रोत प्रमाण (SB 1.13.1): विदुर ने तीर्थयात्रा में मैत्रेय से आत्म-गति का ज्ञान प्राप्त किया: 'विदुरस्तीर्थयात्रायां मैत्रेयादात्मनो गतिम् ज्ञात्वा' (भा. १.१३.१); कौषारव के समक्ष किए प्रश्नों से भी गोविन्द-भक्ति उत्पन्न होने पर विरत हो गए (भा. १.१३.२)। दिशा: शिष्य → गुरु। प्रमाण: प्रत्यक्ष (पञ्चमी विभक्ति 'मैत्रेयात्')।
'भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता' (भा. १.१३.१०) — हृदयस्थ गदाधर के कारण।
श्रीशुक विदुर को 'अमलात्मा' कहते हैं: 'न ह्यल्पार्थोदयस्तस्य विदुरस्यामलात्मनः' (भा. ३.१.४)।
सम्पूर्ण प्रसंग में विदुर के लिये 'क्षत्ता' शब्द का प्रयोग है: 'क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन' (भा. ३.१.१); 'क्षत्ता सकर्णानुजसौबलेन' (३.१.१४)।
उद्धव से अपने सुहृदों का दुःसह वध सुनकर, बुद्धिमान् क्षत्ता ने ज्ञान के द्वारा उठ आये शोक को शमित कर लिया: 'ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुधः' (भा. ३.४.२३)।
विदुर स्वीकार करते हैं कि परा और अवरा के भगवद्-व्रत उन्होंने व्यास के मुख से बारम्बार सुने, किन्तु कृष्ण-कथा के अमृत-प्रवाह के बिना तृप्ति नहीं हुई: 'अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौघात्' (भा. ३.५.१०)। वे कहते हैं कि सुनते रहने पर भी मन तृप्त नहीं होता (भा. ३.५.७)।
विदुर पूछते हैं कि चिन्मात्र, अविकारी और निर्गुण भगवान् के गुण और क्रियाएँ लीला से भी कैसे जुड़ सकती हैं: 'ब्रह्मन् कथं भगवतश्चिन्मात्रस्याविकारिणः । लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणाः क्रियाः' (भा. ३.७.२)। वे बालक के उद्यम का दृष्टान्त स्वयं उठाकर उसकी सीमा भी बताते हैं (भा. ३.७.३), और अन्त में इसे अज्ञान-संकट कहकर निवारण माँगते हैं (भा. ३.७.७)।
भा. ३.७.२१-४१ में विदुर मैत्रेय से सृष्टि-क्रम की एक लम्बी सूची माँगते हैं: महदादि से विराट् की उत्पत्ति, प्रजापति, सर्ग और अनुसर्ग, मनु और मन्वन्तर, वंश और वंशानुचरित, लोक, चार प्रकार की योनियाँ, गुणावतार, वर्णाश्रम-विभाग, ऋषि और वेद, यज्ञ, योग, सांख्य, पाखण्ड-पथ, जीव की गतियाँ, चार पुरुषार्थ, वार्ता और दण्डनीति, श्राद्ध, पितृ, ग्रह-नक्षत्र-तारा, कालावयव, दान, तप, इष्ट-पूर्त, प्रवास और आपद्-धर्म, तत्त्वों का प्रतिसंक्रम, और स्वतः उत्पन्न ज्ञान, भक्ति और वैराग्य। वे इसका औचित्य गुरु-शिष्य-सम्बन्ध से जोड़ते हैं (भा. ३.७.३६)।
भा. ३.१०.१-२ में विदुर पूछते हैं कि भगवान् के अन्तर्हित होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने प्रजाओं की कितने प्रकार से सृष्टि की — दैहिकी और मानसी — और माँग करते हैं कि उनके समस्त संशयों का छेदन हो। भा. ३.१०.१० में वे अद्भुत-कर्म वाले बहु-रूप हरि का उल्लेख कर कालाख्य लक्षण पूछते हैं।
विदुर यम के अवतार हैं: 'यावद्दधार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः' (भा. १.१३.१५) — माण्डव्य के शाप से यम ने सौ वर्ष शूद्रत्व धारण किया, उसी अवधि में अर्यमा ने दण्ड-भार सँभाला। दिशा: अवतार → मूल। प्रमाण: प्रबल साक्ष्य।
धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन द्वारा सभा में अपमानित किये जाने पर विदुर ने स्वयं धनुष द्वार पर रखकर हस्तिनापुर त्याग दिया और पुण्य-तीर्थों में पर्यटन करने लगे: 'स्वयं धनुर्द्वारि निधाय मायां गतव्यथोऽयात्' (भा. ३.१.१६-१९)।
प्रभास में स्वजनों के विनाश का समाचार सुनकर और सरस्वती के तीर्थों का सेवन करके विदुर यमुना पर पहुँचे और वहाँ भागवत उद्धव को देखा: 'यमुनामुपेत्य तत्रोद्धवं भागवतं ददर्श' (भा. ३.१.२१-२४)।
विदुर ने बालक पाण्डवों की विष और लाक्षागृह की अग्नि आदि विपत्तियों से रक्षा की: 'विपद्गणाद्विषाग्न्यादेर्मोचिता यत्समातृकाः' (भा. १.१३.८); तथा 'सर्वान्नः सुहृदः शिशून् अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ' (भा. १.१३.३४)। दिशा: रक्षक → रक्षित। प्रमाण: प्रत्यक्ष।