देवी-देवता और दिव्य पात्र
पुराणों से संकलित देवता, ऋषि, राजा, स्थान और सिद्धांत—खोजें, छानें और प्रत्येक प्रोफ़ाइल खोलें।
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आन्वीक्षिकी
Anvikshiki (the science of inquiry)आन्वीक्षिकी — प्राचीन भारत की विद्या-व्यवस्था में 'तर्क-अनुशीलन विद्या' (लौक्यायन-चाणक्य परम्परा में विद्याओं में गणित): तत्त्व का क्रमबद्ध …
अविद्या
Avidya (nescience)अविद्या — वेदान्त की मूलभूत धारणा: आत्म-तत्त्व को ढकने वाली अज्ञान-शक्ति, जिससे अध्यास (आरोप) होता है। भा. १.३.३३: आत्मनि सत्-असत् का आरोप इ…
अश्वमेध यज्ञ
Ashvamedha Yajnaअश्वमेध यज्ञ — वैदिक श्रौत यज्ञों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विस्तृत; इसमें छोड़े गए अश्व को एक वर्ष तक स्वच्छन्द विचरण करने दिया जाता है …
तुलसी
Tulasiतुलसी — वैष्णव परम्परा की परम पवित्र वनस्पति, विष्णु और कृष्ण की अर्चना में अनिवार्य; उनकी वनमाला और चरण-पूजा तुलसी-दल के बिना पूर्ण नहीं मा…
विराट्पुरुष
Virat-Purushaविराट्पुरुष अथवा वैराज पुरुष भगवान् का वह स्थूल विश्वरूप है जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही उनका शरीर है — पुरुषसूक्त की परम्परा का पुराणिक वि…
प्रणव
Pranavaप्रणव अर्थात् ॐ वह त्रिवृत् (अ-उ-म्) परम अक्षर है जिसे वेद ब्रह्म का ध्वनि-रूप मानते हैं; उपनिषदों में यह ब्रह्म का प्रतीक और ध्यान का आलम्ब…
धारणा
Dharanaधारणा योग के अष्टाङ्गों में छठा अङ्ग है — चित्त को एक देश में बाँधना, जो प्रत्याहार के पश्चात् और ध्यान से पूर्व आता है। भागवत इसे केवल योग-…
शिशुमार-चक्र
Shishumara-chakraशिशुमार-चक्र आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों का वह विन्यास है जिसे पुराण एक शिशुमार (डॉल्फिन अथवा घड़ियाल) के आकार में देखते हैं, जिसकी पूँछ के…
अहङ्कार
Ahankaraअहङ्कार सांख्य-दर्शन का वह तत्त्व है जो महत्तत्त्व से उत्पन्न होता है और जिससे आगे की समस्त सृष्टि निकलती है; इसका स्वरूप 'मैं' और 'मेरा' का…
आकाश
Akashaआकाश पञ्च महाभूतों में प्रथम और सूक्ष्मतम है, जिसका गुण शब्द है। सांख्य और वेदान्त दोनों में यह अवकाश-प्रदाता तत्त्व है जिसमें शेष चारों भूत…
वायु
Vayuवायु महाभूतों में द्वितीय है, जिसका गुण स्पर्श है और जो आकाश से उत्पन्न होने के कारण शब्द-गुण भी धारण करता है। देवता के रूप में वायु प्राण क…
तेज
Tejasतेज पञ्च महाभूतों में तृतीय है, जिसका गुण रूप है और जो पूर्व-अन्वय से स्पर्श तथा शब्द भी धारण करता है। यह अग्नि, प्रकाश, ताप और दृष्टि-सामर्…
जल
Jalaजल अथवा अप् पञ्च महाभूतों में चतुर्थ है, जिसका गुण रस है और जो पूर्व-अन्वय से रूप, स्पर्श और शब्द भी धारण करता है। वैदिक साहित्य में आपः को …
पृथ्वी
Prithviपृथ्वी पञ्च महाभूतों में अन्तिम और स्थूलतम है, जिसका गुण गन्ध है और जो पूर्व-अन्वय से रस, स्पर्श, शब्द और रूप — इस प्रकार पाँचों गुणों से यु…
काल
Kalaकाल — समय, जिसे भागवत यदुवंश के संहार का कर्ता बताता है। भा. ३.४.२९ में शुक कहते हैं: 'ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः । संहृत्य स्वकुलं …
मन
Manasमनस् — सांख्य-क्रम में अहंकार के वैकारिक भेद से उत्पन्न तत्त्व। भा. ३.५.३० में मैत्रेय अहंतत्त्व को त्रिधा बताते हैं — वैकारिक, तैजस और तामस…
अभिमान
Abhimanaअभिमान — तत्त्व, विराट्-पुरुष के आत्मा में प्रविष्ट होकर कर्तव्य-बोध का कारण। भा. ३.६.२५ में: 'आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम् । कर…
दण्डनीति
Dandanitiदण्डनीति — शासन की नीति, जिसे भागवत वार्ता के साथ रखता है। भा. ३.७.३२ में विदुर 'वार्ताया दण्डनीतेश्च श्रुतस्य च विधिं पृथक्' पूछते हैं — वा…
तपस्या
Tapasतप — अनुष्ठान, जिसका फल भागवत जीव को अभय देने के आगे नगण्य बताता है। भा. ३.७.४१ में विदुर कहते हैं: 'सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च तपो दानानि चानघ …
विद्या
Vidyaविद्या — तत्त्व, जिसे भागवत तप के साथ जोड़कर भगवान् के आश्रय वाली बताता है। भा. ३.९.३० में भगवान् ब्रह्मा से कहते हैं: 'भूयस्त्वं तप आतिष्ठ …