देवी-देवता और दिव्य पात्र
पुराणों से संकलित देवता, ऋषि, राजा, स्थान और सिद्धांत—खोजें, छानें और प्रत्येक प्रोफ़ाइल खोलें।
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सात्वत (यादव कुल)
Satvatasसात्वत — यादव-वृष्णि परम्परा के उस भक्त-कुल का नाम है जिसके स्वामी स्वयं कृष्ण कहलाए; भागवत-परम्परा में 'सात्वत' विष्णु-भक्त यादवों का वाचक …
कलियुग
Kali-yugaकलियुग — हिन्दू युग-चक्र का चौथा और अन्तिम युग है (कृत, त्रेता, द्वापर के बाद), जिसमें धर्म का पाद-भाग मात्र रह जाता है और अधर्म बढ़ता है; प…
संसार
Samsaraसंसार (संसृति) — हिन्दू दर्शन की मूलभूत धारणा है: जन्म-मरण का अनादि चक्र जिसमें जीव कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में भ्रमण करता है औ…
गंगा
Gangaगंगा (स्वर्धुनी) — भारत की सर्वाधिक पवित्र नदी है जिसका उद्गम हिमालय (गंगोत्री) में और संगम प्रयागराज में माना जाता है; पुराण-परम्परा में यह…
धर्म
Dharmaधर्म — भारतीय चिन्तन का मूल शब्द है: वह नियम-संहिता और ऋत-बोध जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्माण्ड को धारण करता है; वर्णाश्रम-व्यवस्था, सदाचरण और …
रोमहर्षण
Romaharshanaरोमहर्षण — व्यास के शिष्य, सूत के पिता; इतिहास-पुराणों के प्रथम धारक: 'इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः' (भा. १.४.२२ — सूत के शब्द)।
नर
Naraनर — प्राचीन तपस्वी ऋषि: बदरिकाश्रम में नारायण के साथ तपस्या करने वाले प्रसिद्ध ऋषि-युग्ल 'नर-नारायण' का एक; महाभारत-परम्परा में अर्जुन इन्ह…
नारायण
Narayanaनारायण — (क) ऋषि-रूप में: नर के साथ बदरी-आश्रम के तपस्वी युग्ल का दूसरा सदस्य; (ख) भगवान्-रूप में: विष्णु-कृष्ण का परम नाम। भा. १.२.४ में सू…
जय
Jaya'जय' — महाभारत का प्राचीन नाम है ('जय' अर्थात् विजय-ग्रंथ, जिसका उल्लेख महाभारत के भीतर भी आता है)। भा. १.२.४ में विधि है कि नारायण, नर, सरस…
भक्ति
Bhaktiभक्ति — परमेश्वर में प्रेम-समर्पण: भागवत के अनुसार समस्त धर्मों का शिखर। भा. १.५ में: स्वधर्म त्यागकर भजन में अपक्व गिरने वाले का भी अभद्र न…
वैराग्य
Vairagyaवैराग्य — वैराग्य अर्थात् अनात्म-वस्तुओं से विरक्ति, राग-द्वेष के बंधनों से चित्त की स्वाधीनता — भारतीय साधना-परम्परा का आधारभूत अंग है (ज्ञ…
ज्ञान
Jnanaज्ञान — तत्त्व-बोध है: वेदान्त-परम्परा में आत्म-ब्रह्म के साक्षात्कार का वह ज्ञान जो अज्ञान का विनाश कर मुक्ति देता है; साधना-त्रयी (कर्म-ज्…
अर्थ
Arthaअर्थ — पुरुषार्थ-चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में तृतीय है: भौतिक समृद्धि, सम्पत्ति और राजनीतिक-आर्थिक उन्नति का व्यवस्थित अर्थ; राजनीति…
काम
Kamaकाम — पुरुषार्थ-चतुष्टय का तृतीय सदस्य है: इच्छा और विधिवत् भोग; वैदिक देवता-कामदेव के रूप में भी विख्यात। संसाधित पदों में इसका मर्यादित स्…
जीव
Jiva (the living being)जीव — आत्मा का संसार-व्यवहारी रूप है: वह चैतन्य-द्रष्टा जो कर्मों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण करता है और जिसका स्वरूप-साक्षात्कार म…
मोक्ष
Mokshaमोक्ष (अपवर्ग) — पुरुषार्थ-चतुष्टय का चतुर्थ और परम तत्त्व है: संसार-बन्धन से नित्य मुक्ति, जो भारतीय दर्शनों में जीवन का अन्तिम लक्ष्य मानी…
ब्रह्म
Brahmanब्रह्म — उपनिषद्-वेदान्त का परम तत्त्व है: सत्यं-ज्ञानमनन्तं ब्रह्म — वह एक निर्गुण चिदानन्द-सत्ता जिससे जगत् प्रवर्तता है और जिसका साक्षात्…
परमात्मा
Paramatmanपरमात्मा — सर्वान्तर्यामी परम आत्मा है: वेदान्त-परम्परा में ईश्वर का वह रूप जो प्रत्येक हृदय और प्रत्येक परमाणु में साक्षी-रूप से व्याप्त रह…
वर्णाश्रम धर्म
Varnashrama-dharmaवर्णाश्रम-धर्म — वैदिक समाज-व्यवस्था है: चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्या…
कर्म
Karmaकर्म — भारतीय दर्शन की केन्द्रीय धारणा है: क्रिया और उसका अनुषंगी फल — जो जीव को बंधन और पुनर्जन्म में बाँधता है; कर्मकाण्ड (वैदिक यज्ञ-परम्…